खामोश निगरानी: एक फील्ड ऑफिसर की डायरी
समरी के घने जंगलों में छिपी हैं अनकही कहानियाँ,
हर साया कुछ कहता है, हर हवा में हैं निशानियाँ।
मैं दिखता नहीं, पर हर हलचल पर नज़र रहती है,
मेरा वजूद खामोश है, पर जिम्मेदारी गहरी रहती है।
सरगुजा की मिट्टी में चलती है कई परतों की लड़ाई,
ऊपर से सन्नाटा, अंदर सुलगती सच्चाई।
मैं कानून का सिपाही हूँ, पर नाम कहीं दर्ज नहीं,
हर मिशन के बाद भी मेरा कोई ज़िक्र नहीं।
अब खतरा सिर्फ जंगलों तक सीमित नहीं रहा,
अंबिकापुर की गलियों में भी ज़हर पल रहा।
युवा खो रहे हैं खुद को नशे की गिरफ्त में,
गांजा और ड्रग्स ने जकड़ लिया है उन्हें चुपचाप अपने शिकंजे में।
जिन आँखों में सपने थे, अब वहाँ धुंध छाई है,
माँ-बाप की तकलीफ भी उन्हें समझ न आई है।
एक माँ रातों में जागकर बस दुआएँ माँगती है,
एक पिता समाज के सवालों में खुद को खोता जाता है।
जब हम पकड़कर लाते हैं उन्हें पूछताछ के उस कमरे में,
तब असली जंग शुरू होती है मेरे ही अंदर में।
कानून कहता है—“सच निकालो, हर हाल में”,
पर दिल पूछता है—“क्या ये सब खुद की मर्जी से हैं इस जाल में?”
उनकी आँखों में डर नहीं, एक खोखलापन दिखता है,
जैसे वो खुद भी नहीं जानते कि उनका रास्ता किस ओर जाता है।
मैं सवाल करता हूँ सख्ती से, आवाज़ में ठहराव रखकर,
पर हर जवाब के पीछे का दर्द भी महसूस करता हूँ अंदर।
यहाँ भावनाएँ और कर्तव्य अलग-अलग रास्ते हैं,
एक में इंसानियत है, दूसरे में नियमों के वास्ते हैं।
मैं दोनों के बीच खड़ा, हर पल खुद को तौलता हूँ,
कभी कानून जीतता है, कभी दिल को समझाता हूँ।
न गुस्सा दिखा सकता हूँ, न कमजोरी का कोई निशान,
मेरी खामोशी ही मेरी पहचान, मेरा काम ही मेरी शान।
हर सूचना, हर शक, हर हलचल पर नज़र रखता हूँ,
पर खुद के अंदर उठते सवालों से भी रोज़ लड़ता हूँ।
समरी के जंगल आज भी उतने ही गहरे हैं,
पर अब शहर के अंधेरे और भी चेहरे लिए हुए हैं।
फिर भी एक उम्मीद है, जो बुझने नहीं देता मुझे,
कि एक दिन ये अंधेरा हार जाएगा उजाले से।
मैं एक फील्ड ऑफिसर हूँ—नाम से ज्यादा काम से पहचाना जाता हूँ,
हर सच्चाई के पीछे छिपा सच सामने लाता हूँ।
दिल रोता है कभी-कभी, पर चेहरा नहीं बदलता,
क्योंकि मेरा हर कदम देश के लिए ही चलता।
जब बात हो सुरक्षा की, कानून की, और देश की आन की,
तब खुद को भूल जाना ही असली पहचान है एक जवान की।
आँखों में थकान हो, पर कदम कभी रुकते नहीं,
क्योंकि इस खामोश जंग में हम कभी झुकते नहीं।
समरी के जंगल से लेकर शहर की हर गली तक,
मैं हूँ—बिना नाम, बिना चेहरे—बस देश की ढाल बनकर अब तक।