नक़ाब

समाज हमें सिखाता है—

“रोशनी में इंसान को पहचानो…”

पर क्या रोशनी कभी सच बताती है…

या बस एक सजा हुआ झूठ होती है?

ज़रा सोचो—

जो दिख रहा है, वही सच है…

या सच हमेशा वो होता है

जो छुपा रह जाता है?

रोशनी में हर चेहरा साफ़ दिखता है,

हर मुस्कान भरोसेमंद लगती है।

पर क्या कभी किसी ने ये पूछा—

मुस्कान के पीछे क्या दबा हुआ है?

क्योंकि इंसान अच्छाई दिखाता है…

पर क्या अच्छाई उसका स्वभाव है

या बस एक ज़रूरत?

और अगर ज़रूरत खत्म हो जाए…

तो क्या वही इंसान वैसा ही रहेगा?

अंधेरा अजीब होता है…

वो कुछ बनाता नहीं—

वो सिर्फ हटा देता है।

दिखावा,

संयम,

और वो हर परत…

जिसे हम “चरित्र” समझ लेते हैं।

तो जब सब हट जाता है—

जो बचता है…

क्या वही असली इंसान है?

या फिर हम सब इतने टुकड़ों में बंटे हैं

कि “असल” जैसा कुछ होता ही नहीं?

बताओ—

क्या इंसान अपने कर्मों से बनता है…

या अपने विचारों से…

जो वो कभी ज़ाहिर ही नहीं करता?

और अगर उसके अंदर चल रही लड़ाई

उसके बाहर दिखने वाले चेहरे से अलग हो…

तो असली कौन है?

वो जो दुनिया देखती है…

या वो जिससे वो खुद भी डरता है?

कभी ये भी सोचा है—

हम दूसरों के अंधेरे को जज करते हैं…

पर अपने अंधेरे को क्या नाम देते हैं?

“मजबूरी”?

“हालात”?

या फिर “इंसानियत”?

तो क्या सच में अंधेरा गलत है…

या वो सिर्फ वो आईना है

जिसमें हम खुद को देखना नहीं चाहते?

क्योंकि रोशनी में इंसान समझ में आता है…

पर अंधेरे में इंसान समझ आता है।

और अब एक सवाल—

अगर तुमसे तुम्हारी सारी अच्छाइयाँ छीन ली जाएँ…

तुम्हारी पहचान, तुम्हारी छवि, तुम्हारा दिखावा…

तो जो बचेगा—

क्या तुम उसे स्वीकार कर पाओगे?

या फिर…

तुम खुद से ही नज़रें चुरा लोगे?

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Harsh Pandey
Chhattisgarh