मुश्किल है

ये कविता मैंने कुछ वर्ष पहले लिखी थी | बस यूँ ही कुछ मन में विचार उठे और लिख दिया जो प्रस्तुत कर रहा हूँ |

 

जब लत चोरी की लग जाए ,

मेहनत से कमाना मुश्किल है |  

जब जुबाँ चटोरी हो जाए ,

संयम से खाना मुश्किल है ||

 

पेग दो पेग लेने की आदत ,

जाने क्यों छुड़ाना मुश्किल है |

वादे करना आसान मगर ,

वादों को निभाना मुश्किल है ||

 

रिश्तों में कमीं यकीन की हो , 

तो इन्हें निभाना मुश्किल है |

दिल में पड़ जाए गाँठ कभी ,

तो फिर सुलझाना मुश्किल है ||

 

इस भौतिकवादी दुनियां में ,

इज़्ज़त को बचाना मुश्किल है |

अध्यात्म की बातें कौन करे ,

ज़िंदा रह पाना मुश्किल है || 

लालच व मोह की दुनियां में ,

ईमान बचाना मुश्किल है |

इंसान की क्या औकात यहाँ ,

भगवान् बचाना मुश्किल है ||

 

सोलह सत्तरह की पींग चढ़े ,

यौवन को दबाना मुश्किल है |

जब आग लगी हो दिल में तो ,

पानी से बुझाना मुश्किल है ||

 

बीवी को बीते लम्हों की ,

हर बात बताना मुश्किल है |

किसके मायने वो क्या समझे ,

अंदाज़ लगाना मुश्किल है || 

हम प्यार तुम्हें कितना करते ,

तुमको समझाना मुश्किल है |

बस यूँ ही शक न किया करो ,

कहीं आना जाना मुश्किल है || 

 

स्वरचित – : चंद्र  मोहन कत्याल

एल्डिको ग्रीन मीडोज , ग्रेटर नॉएडा

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