ये कैसी ज़िद है……
ये कैसी ज़िद है न हटने की,
ये कैसी ख़ुद्दारी है न झुकने की?
तुम टूट जाओगे दीवार पे सर टकराने से,
ये कैसी हिमाक़त है, अड़ जाने की?
आसान हो जाएगा,
बस इतनी-सी बात मान लेने से—
क्या सुधर जाएगा ज़माना का
तेरी दयानत से?
क्या घट जाएगा ज़माने का
तेरी ख़यानत से?
ये उसूल तेरे लिए अनमोल सही,
मगर दुनिया में इनका मोल नहीं।
फिर भी तू खड़ा है—
सब कुछ तो तेरा लुटा है,
फिर भी तू खड़ा है।
ये दीवानगी समझ में आती नहीं,
हर किसी को ये अदा आती नहीं ।