Nitya: Kamakhya ki Saatvi Gufa

अध्याय 1: प्रोफेसर नित्या और पुरातत्व विभाग का बुलावा

1. आधी रात का ईमेल

दिल्ली विश्वविद्यालय का पुरातत्व विभाग सुबह के दस बजे खुलता था। पर उस दिन — 14 नवंबर — विभाग के सभी दरवाज़े रात के तीन बजे ही खुल गए।

प्रोफेसर नित्या चौधरी अपनी कुर्सी पर बैठी थीं, सामने 1984 का एक पीला पड़ चुका अभिलेख रखा था। वह विभाग की सबसे वरिष्ठ पुरातत्वविद् थीं — विशेषज्ञता ‘लुप्त तांत्रिक मंदिरों का संरक्षण’। साठ वर्ष की उम्र में भी उनकी आँखों में वही चमक थी जो खुदाई के पहले दिन होती है।

पर इस रात वह चमक कुछ और थी — डर।

चार घंटे पहले उन्हें एक ईमेल आया था। भेजने वाला कोई नहीं था। ‘प्रेषक’ खाली था, पर सब्जेक्ट लाइन में लिखा था:

“कामाख्या की सातवीं गुफा — खुदाई की अनुमति। उच्चाधिकारियों द्वारा सील।”

ईमेल में एक अटैचमेंट थी — 1942 की ब्रिटिश सरकार की गुप्त फ़ाइल, जिस पर लिखा था: ‘ऑपरेशन योनिपीठ — असफल। सभी 17 खुदाईकर्ता लापता। सातवीं गुफा अभिशप्त है।’

प्रोफेसर नित्या ने यह फ़ाइल अपने जीवन में कभी नहीं देखी थी। पर उनका नाम उस फ़ाइल के अंतिम पृष्ठ पर लिखा था — एक ‘डिकोडर’ के रूप में।

2. विभाग का बुलावा — जो बुलावा नहीं था

सुबह के 10:15 बजे। विभाग का मुख्य कक्ष। उपस्थित थे:

1. प्रोफेसर नित्या चौधरी — अध्यक्ष।

2. डॉ. व्योम शास्त्री — तांत्रिक साहित्य के विशेषज्ञ (जिन्हें बुलाया भी नहीं गया था)।

3. अन्वेषा मुखर्जी — शोधार्थी (उसे किसी ने सूचना नहीं दी, वह अपने आप आ गई थी)।

4. एसीपी अमरनाथ — पुलिस के स्पेशल ब्रांच से (सरकारी प्रतिनिधि)।

एसीपी ने एक सीलबंद लिफाफा मेज पर रखा। उसे खोलते ही उसमें से बालू (रेगिस्तान की रेत) गिरी।

“यह कल रात गुवाहाटी पुलिस स्टेशन के दरवाज़े पर मिला। मंदिर समिति ने सातवीं गुफा पर नज़र रखने की मांग की है।” एसीपी ने रुककर कहा — “और प्रोफेसर, आपको चिट्ठी में नामांकित किया गया है।”

प्रोफेसर नित्या ने चिट्ठी पढ़ी। उनके हाथ काँपने लगे।

चिट्ठी का मूल पाठ (तांत्रिक लिपि में):

“नित्ये, तू जानती है कि हमने 1984 में उस गुफा के दो दरवाज़े बंद किए थे। अब तीसरा दरवाज़ा खुल गया है। यदि तू नहीं आई, तो पूरा नीलांचल जल जाएगा। हस्ताक्षरकर्ता — तुम्हारी गुरु बहन, जिसे तुमने मरा हुआ छोड़ दिया था।”

वह चिट्ठी किसी जीवित व्यक्ति ने नहीं लिखी थी — क्योंकि प्रोफेसर नित्या की गुरु बहन ‘मंगलानंदा’ 1984 में सातवीं गुफा के भीतर ही मर गई थी।

3. अन्वेषा का अनचाहा प्रवेश

अन्वेषा उस समय हॉल में बिना बुलाए आई थी। वह नित्या की प्रिय शोधार्थी थी — पर इस बैठक में उसके लिए कोई सीट नहीं थी।

“तुम यहाँ कैसे?” नित्या ने सख्ती से पूछा।

अन्वेषा ने अपना मोबाइल बढ़ाया। उसे भी आधी रात को वही ईमेल मिला था — पर अंतर था। उसके ईमेल में एक वीडियो क्लिप थी।

वीडियो में एक अँधेरी गुफा दिख रही थी। दीवारों पर खून से लिखा था — “अन्वेषा, तुम्हारी माँ यहाँ नहीं मरी थी। उसे ज़िंदा दफ़नाया गया था।”

वीडियो के अंत में एक महिला की परछाई उठती है — बिल्कुल अन्वेषा की मृत माँ की कद-काठी। पर उसके सिर के पीछे जल रहा था नीला अग्नि-शिखा।

प्रोफेसर नित्या ने वीडियो देखा। विभाग की दीवारों पर लगे बल्ब एक-एक कर फटने लगे। डॉ. व्योम चुप थे, पर उनकी नज़र अन्वेषा पर थी — ऐसी नज़र, जैसे वह इस दृश्य को पहले भी देख चुके हों।

4. नित्या का इकबालिया बयान — गुफा के तीन दरवाजे

आखिरकार प्रोफेसर नित्या ने सबको शांत किया। उन्होंने अपने कमरे के पीछे एक गुप्त तिजोरी खोली — और एक चर्मपत्र निकाला।

यह चर्मपत्र ‘रुद्रयामल तंत्र’ का खोया हुआ अध्याय था।

उस पर सातवीं गुफा के तीन दरवाज़ों का उल्लेख था:

1. प्रथम द्वार (अग्नि द्वार) — जहाँ से प्रवेश करने वाला अपने पिछले सात जन्म देखता है। यदि उनमें हत्या हो, तो वह जलकर राख हो जाता है।

2. द्वितीय द्वार (सर्प द्वार) — यहाँ ‘कालिया नाग’ की 1008 कुंडलियाँ हैं। यह केवल उन्हीं को पार करने देता है जिनका कोई ऋणी (शिष्य) गुफा के बाहर उनके लिए रुदन कर रहा हो।

3. तृतीय द्वार (नरबलि द्वार) — यह दरवाजा सिर्फ़ तभी खुलता है जब कोई प्रेमी अपने प्रेम का सबसे कीमती अंग (आँख या स्मृति) गुफा को अर्पित कर दे।

“1984 में हम तीसरे दरवाज़े तक पहुँचे थे।” नित्या की आवाज़ टूटी। “मंगलानंदा ने मुझसे कहा — ‘अपनी आँखें मत देना, बहन। बल्कि मैं यहाँ रुकती हूँ।’ उस दिन के बाद मैंने गुफा को सील कर दिया। पर अब तीसरा दरवाज़ा बिना प्रेमी के खुल गया है — जिसका अर्थ है कि गुफा के भीतर से किसी ने उसे खोला है।”

5. फैसला — चार दिन की तैयारी

एसीपी अमरनाथ ने कहा — “सरकार इस अभियान के लिए चार दिन दे रही है। 18 नवंबर को सूर्यास्त तक, आप सातवीं गुफा तक पहुँच कर उसे पुनः सील करेंगे। असफल रहे — तो सेना आएगी और पूरी पहाड़ी को ब्लास्ट कर देगी।”

प्रोफेसर नित्या ने तीन नाम तय किए:

· स्वयं — मार्गदर्शक।

· डॉ. व्योम — तांत्रिक आपदा प्रबंधक।

· अन्वेषा — क्योंकि गुफा उसे ही बुला रही थी।

डॉ. व्योम ने अपनी सीट से उठते हुए एक अंतिम प्रश्न पूछा:

“प्रोफेसर, एक बात बताइए — 1984 में आपकी गुरु बहन ने अपने शरीर का कौन-सा अंग गुफा को दिया था? क्योंकि आपने लिखा है कि उन्होंने आँखें नहीं दीं, तो क्या दिया?”

प्रोफेसर नित्या चुप रहीं। उन्होंने केवल अपना दाहिना हाथ ऊपर किया — जिसमें एक अँगूठा गायब था।

“उसने मेरा अँगूठा काट कर गुफा को चढ़ा दिया था, ताकि मैं बाहर आ सकूँ। और अब वही अँगूठा

तीसरे दरवाज़े की घंटी बजा रहा है।”

अध्याय 1 समाप्त। (शब्द संख्या: लगभग 780)

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majhinayan938
West Bengal