महामारी

एक भगदड़ ऐसी मची
सूने हो गए सभी गलियारे
और भीड़ घरों में जा बसी।

दीवारें जो करती थी बातें
आज खामोश है पड़ी।
सड़कों पर महामारी की 
जैसे रूह हो आन बसी।

हर तरफ अनिश्चितता हैं छाई
घर बैठें कैसे हो कमाई।
खाँसी और छींक से भी घबरा रहा है इन्सान। 
कहीं उसके संपर्क से 
ना हो जाए किसी और को नुकसान।

खुली हवा में श्वास लेना पड़ गया है भारी।
कितनी निर्दयी-निर्मोही है यह महामारी।
(मंजु)

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manjus1970