समाज का रूप
देखकर हालत इंसानियत के हर कोई आज बोल उठा,
बेजुबानों को खूंखार कहने वाले इंसान इसमें शामिल हो रहा,चलता समाज जिन रीतों पर रीत किसने बनााई हैं, दिया जाता बेजुबानों को और देवी की खुशी इसी में बताई है,कपड़ों से तय होता जहां पैमाना चरित्र संस्कारों का,उस समाज में हम रहने वाले बस मूकदर्शक बनते हैं,दुहाई देते सेक्युलरिज्म की पर खुद ही भेदभाव करते हैं,होती जरूरत आवाज़ उठाने की तो मौन धारण कर लेते हैं,रोके न रुकती यह गाड़ी क्यूंकि हमें छोड़ कोई ओर चलाता है, समाज की गलती देखने वालों को खुद में कुछ नजर नहीं आता है