उम्र
आइना देख कर वो सहम सा जाता है
शायद हकीकत नहीं देख पाता है
ख़ुद ज़मीं की सच्चाई न देख सका
औरों को फिर भी आसमान दिखाता है
ख़ामोशियों में अपने ज़ख़्म गिनता है
हँसी को ओढ़कर हर दर्द छुपाता है
जब-जब ख़ुद ग़मगीन हो जाता है
वो दूसरों को ही दिलासा दिलाता है
टूट कर भी संभलने का हुनर जानता है
अपने आँसू तक तन्हा बहाता है
कितनी अजीब है ये फ़ितरत उसकी
ख़ुद जलता है पर औरों को रौशनी दिखाता है