वो जो था ही नहीं
याद है ?
जब हम दो दोस्त बने थे
तब वो था नहीं, कौन और
कहाँ ? उन शहर की दुकानों में
और विचारों के बज़ारों में ॥1॥
जब हम नए-नए दोस्त बने थे
तो हमारे साथ में प्यारी-प्यारी बातें थी
एक दूसरे को जानने की – पहचानने की
अजीब सी वो आदत थी ॥2॥
विश्वास था अडिग ऐसा
नहीं तोड़ेंगे साथ कभी
धीरे-धीरे विश्वास का
शोर ख़ामोश होने लगा था
हमारे दोस्ती के बीच कोई
तीसरा पनपने लगा था ॥3॥
शायद कसूर किसी का भी नहीं था
बस वक़्त थोड़ा खराब था
हम दोनों सच ढूंढते रहे
और झूठ बीच में बेहिसाब था ॥4॥
दोस्ती के प्यार में हम हार बैठे थे
झूठी गलतफहमियों के शिकंजों में जकड़ गए थे
किसी एक की छोटी-छोटी गलतियों से
खफ़ा हो बैठे थे
हम दोस्ती के प्यार में हार बैठे थे ॥5॥
गलतफहमियों को हम सच मान बैठे थे
उस शक को ही हम अपना मान बैठे थे
जिस शक ने वो दरार पैदा करी
उसको ही नया निर्माण मान बैठे थे ॥6॥