खुदगर्ज़
देख रही हूँ कुछ दिनों से,
बगावतों का शोर ज्यादा है
ये खुदगर्ज़ तो कुछ पल में जलकर राख हो जाएंगे
मगर हमारा तो सूरज की तरह चमकने का इरादा है।
मिटा पाई न जिस मुल्क को
बरसो की गुलामी और साज़िशें
ऐसे बेवकूफो से निपटने का
तकाज़ा हमे बहुत ज़्यादा है।
खुदा के नाम पर जो हैवानियत का सौदा कर रहे है,
हमे मालूम है,
बेशक ये इंसानियत से डर रहे है।
हमारी खिड़कियों पर पत्थर फेंकने वाले महान है,
शायद उनके घर कांच के है ,इस बात से अनजान है।
#palak Poetry