इश्क़”घर से”
इश्क़ हो गया है
घर को मुझसे
जितना दूर जाने की कोशिश करती हूं
उतना ही अपनी बाहों में समेट लेता है।
मैं दहलीज़ लाँघने को क़दम बढ़ाती हूँ
दीवारे कान खड़े कर लेती है,
शायद दरवाज़ा इसीलिए बंद हो जाता है
क्योकि उसे सब खबर रहती है।
इश्क़ हो गया है
घर को मुझसे,
कभी बरामदे से बाहर झांकती हूँ
तो तो पर्दे सरसराहट करने लगते है,
कितना चाहते है मुझे ,यह बताने को आहट करने लगते है।
इश्क़ हो गया है
घर को मुझसे।
आईने में निहारती हूँ
जब भी खुदको
मानो आईना
अपने अक्स से
बाहर आने से रोक लेता है,
बाहर की हर नज़र से बचाकर
रखना चाहता है
सिर्फ अपनी नज़रो में।
इश्क़ हो गया है
शायद घर को मुझसे
या मुझको घर से।
उफ्फ…….
#palakpoetry