Darr to lagta hai
क्या करु डर तो लगता है , कैसे बड़ाऊ वो एक कदम , अपनी मंजील की ओर खुदसे ही डर लगता है . लड़ रहा हू अन्दर जो तूफान है भवानाओ की काष्मकश का . ऐसा क्या है , जो पिछे धकेल रहा है . क्या करु मंजिल सामने खडी है , इसलिये उस दूरी को कम कर रहा हू , लड़ रहा हू आगे बढ रहा हू .