पिता का फ़र्ज़

जहाँ बात पित्रसत्ता की आती है,

वहाँ महिलों की आवाज़ को दबा दिया जाता है,

फिर उसी औरत को महान बताकर,

देवी की मूरत बना दिया जाता है,

दूसरी ओर पिता के कामों को,

उसका फ़र्ज़ बना दिया जाता है,

दिन रात मेहनत कर वह

अपने परिवार के लिए रोटी जुटाता है

फिर क्यों हर बार महानता का झंडा,

माँ के हाथ थमा दिया जाता है?

परिवार की रक्षा के लिए,

पिता खुद को गिरवी रख आता है,

जब दोनों का फ़र्ज़ बराबर है,

क्यों अक्सर माँ के बलिदानों को,

पिता के फ़र्ज़ से ऊपर बता दिया जाता है?

 

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Pranchal Gupta