मान जा रे इंसान !
मान जा रे इंसान,
ये सवाल तेरी जिन्दगी का है,
तेरे अपनों की खुशहाली का है,
जो बहुत प्यार करते हैं तुझसे ।
वैसे तो ये परिणाम है,
तेरी ही करतूतों का,
जुल्म किये जो तूने प्रकृति पर,
समझ कर उसको बेजुवां ।
अब अगर कुछ दिन घर पर रह ले,
तो प्रकृति का ताप भी कुछ कम हो जाएगा,
ये धरती माँ है तेरी,
माफ़ तो तुझे कर ही देगी ।
पर तुझे पश्चाताप तो करना होगा,
उसकी शक्ति को समझना होगा,
तेरी उपलब्धियां धरीं रह जायेंगी,
अगर आंच उसकी आबरू पर आएगी ।