मान जा रे इंसान !

मान जा रे इंसान,

ये सवाल तेरी जिन्दगी का है,

तेरे अपनों की खुशहाली का है,

जो बहुत प्यार करते हैं तुझसे ।

वैसे तो ये परिणाम है,

तेरी ही करतूतों का,

जुल्म किये जो तूने प्रकृति पर,

समझ कर उसको बेजुवां ।

अब अगर कुछ दिन घर पर रह ले,

तो प्रकृति का ताप भी कुछ कम हो जाएगा,

ये धरती माँ है तेरी,

माफ़ तो तुझे कर ही देगी ।

पर तुझे पश्चाताप तो करना होगा,

उसकी शक्ति को समझना होगा,

तेरी उपलब्धियां धरीं रह जायेंगी,

अगर आंच उसकी आबरू पर आएगी ।

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Pranchal Gupta