KHAMOSHI (खामोशी)

हर खामोशी, दर्द बयाँ करती है।

जानकर भी, अनजान बना करती है।

शब्द हैं, निःशब्द बन,

निर्निमेष पलकों से,

जला दीप आशाओां के,

इन्जार किया करती हैँ।

गुजरेंगें पतझड़ के पल भी,

आएगी कभी बहार,

 उजडे चमन में भी,

खिलेंगें फूल खुशियों के मन में,

गुजरा पल इतिहास बन जाएगा,

सब एक पल में,

पन्नों में सिमट जायेगा।

आशा का दीपदिवाकर बन ,

 जीवन ज्योति जलाएगा।

बिछड़े फिर  मिल जाएगें,

पर उन्हें भूल न पाएगें,

 दुख में, जिनका साथ रहा

पितृ सम सिर पर, जिनका हाथ रहा।

न उऋन हृदय हो पाएगा

एक शून्य स्वत: हो जाएगा।                                                   

 

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PRAVEEN KUMAR MISHRA