उठो पार्थ तुम अपना शौर्य आज दिखला दो ,सौ पर पांच पड़ते हैं भारी कैसे यह कौशल दिखला दो ,रण में खड़ी भवानी को अपना लहू चढ़ा दो ,भूमि पर गिरी धनूईया पे तुम अपना तीर चढ़ा दो, और बहुत सज चुके दरबार अब तुम इस रण को भी सजा दो ,
हे माधव कैसे चढ़ा लूं तीर अपने धनूईया पे ,कैसे सजा दूं सिंहासन अपने परिजनों की मृत्यु सैया पे ,कैसे हत्यारा में बन जाऊं अपनी कुल के सहैया पे, कैसे कैसे कैसे माधव मैं अस्त्र उठा लूं अपनी इन करो में कैसे अपनो का खून लगा लु,
मुस्कुरा कर माधव बोले ठीक कहा पार्थ तुमने,मोह का पर्दा ओढ़ कर भूल गए हो तुम सबमें ,भूल गए तुम वह दिनकर जब तू दुशासन में उतरे थे द्रोपदी के कपड़े चुन चुन कर, भूल गए शकुनी को जिसके पासों का फेरा था तुम्हारे सारे परिवार को जिसने वन में भेजा था, भूल गए लक्ष्य ग्रह की अग्नि तो जरा तुम याद करो और फिर भी नहीं उठानी धनुष तो मेरा अपमान भी याद करो।