Views 499राहज़ुबां से निकला शब्दों का तीर प्यादे से आज़ पिट गया वज़ीर चलूँ बाज़ी की चाल आख़िरी या शब्दों को पुनः सजाऊँ मैं ? राह कौन सी जाऊँ मैं, राह कौन सी? सपना देखा और उठ चल गया कुछ क़दम अंगारों से जल गया मरहम औरों से चाहूं या स्वयं मरहम लगाऊँ मैं ? राह कौन सी जाऊँ मैं ? ज़मीन से दूर , ऊँचे – ऊंचे पहाड़ में आज़ बैठा मैं, कल उडूंगा बयार में पग–पग का हिसाब चलूँगा या साथ किसी का पाऊँ मैं ? राह कौन सी जाऊँ मैं ? चार दिन मिले मुझे उधार में चांदनी का सोंधापन, इस संसार में बना रहा मैं कर्ज़दार यूं ही उस जहां को त्याग , नया संसार बसाऊँ मैं ? राह कौन सी जाऊँ मैं ; राह कौन सी ? धूप से चलकर छाँव के साये में चार लोग हैं, जीवन किराये में चारों को तो अपना ही कहता हूं पर व्यक्ति विशेष किसे बुलाऊँ मैं ? राह कौन सी जाऊँ मैं ; राह कौन सी ?? Related Leave a ReplyCancel reply