Tweet Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Print (Opens in new window) Print Views 388राहज़ुबां से निकला शब्दों का तीर प्यादे से आज़ पिट गया वज़ीर चलूँ बाज़ी की चाल आख़िरी या शब्दों को पुनः सजाऊँ मैं ? राह कौन सी जाऊँ मैं, राह कौन सी? सपना देखा और उठ चल गया कुछ क़दम अंगारों से जल गया मरहम औरों से चाहूं या स्वयं मरहम लगाऊँ मैं ? राह कौन सी जाऊँ मैं ? ज़मीन से दूर , ऊँचे – ऊंचे पहाड़ में आज़ बैठा मैं, कल उडूंगा बयार में पग–पग का हिसाब चलूँगा या साथ किसी का पाऊँ मैं ? राह कौन सी जाऊँ मैं ? चार दिन मिले मुझे उधार में चांदनी का सोंधापन, इस संसार में बना रहा मैं कर्ज़दार यूं ही उस जहां को त्याग , नया संसार बसाऊँ मैं ? राह कौन सी जाऊँ मैं ; राह कौन सी ? धूप से चलकर छाँव के साये में चार लोग हैं, जीवन किराये में चारों को तो अपना ही कहता हूं पर व्यक्ति विशेष किसे बुलाऊँ मैं ? राह कौन सी जाऊँ मैं ; राह कौन सी ?? Related Leave a ReplyCancel reply