मुसाफ़िर
मुसाफ़िर मैं,
रास्तों की ख़ाक छानता हूं,
काबिल शायद हो गया हूं,
मुश्किलों को पहचानता हूं,
ये सफ़र की तलब है,
या आज़ाद हवाओं का नशा,
मैं समय का हूं शागिर्द,
उसके डर से कांपता हूं।
– रितेश
मुसाफ़िर मैं,
रास्तों की ख़ाक छानता हूं,
काबिल शायद हो गया हूं,
मुश्किलों को पहचानता हूं,
ये सफ़र की तलब है,
या आज़ाद हवाओं का नशा,
मैं समय का हूं शागिर्द,
उसके डर से कांपता हूं।
– रितेश