मुफ़्त के तोते

मेरे घर से लगे बिजली के तार से दूसरे घर के तार तक बैठे

पंद्रह बीस तोते

रोज़ सुबह मेरे पालतू होने आते हैं।

मैंने उन्हें इजाज़त दी है

आसमान में उड़ने की

और जब चाहे मेरे घर आगे बैठ जाने की।

मेरी छत पर बिखरे दाने उनके हैं

मैं उसे पड़ोसी के घर जाते देख भी नहीं चिल्लाता।

मैं उनके कभी नहीं खाने पर भी नहीं झल्लाता।

मेरे तोते वफादार हैं

वो अपनी स्वंत्रता को खूब समझते हैं।

वो मेरी गुलामी अपने अनुसार करते हैं।

मैंने अपने पिंजरें के पैसे बचाएं हैं

ये तोते भी मुझे मुफ़्त में मिले हैं

इन्हें खुला छोड़ मैंने अपने इंसान होने के पाप मिटाएं हैं।

– रोहित सुनार्थी ‘प्रलय’

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Rohit sunarthi