तेरे शहर में

ढूंढने सुकून थे आये

चाहते थे ज़िंदगी के साये

लेकिन मिला कैसा ये जहर

आके तेरे शहर में

 

शीशे की तरह टूटे सपने

कहीं खो गए मेरे अपने

पाया हमने  ये अजीब कहर

रहके तेरे शहर में

 

छाया अजीबसा अंधेरा

धुंधलाती राहें, लगे जैसे कोहरा

लगता है अनजान ये नगर

खोके तेरे शहर में

 

खो गयी रिश्तोंकी गहरी

मिल रही, मंजिल मंजिल तनहाई

दौडती है ख़ामोशी की लहर

दौड़के तेरे शहर में

 

 

जारी है अभीभी तुम्हारी तलाश

समझ पाते तुम मुझे, काश

दूर तो तुमसे अगर

मिलके तेरे शहर में

 

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sandeep kajale