Saanik
चल पड़ा था मैं घर से हौसले बुलंद कर के,उम्मीदों से भरे सपने ले के।मर मिटेंगे अपने देश के लिए,
सपना ये ना मेरा था न तेरा था..सपना ये हम सबका था,अपने “हिन्दोस्तां” का था।
खुशबू ये मेरे वतन की समेट ली थी मैंने,आँसु ना बहने दूँगा मैं किसी के, ये ठान ली थी मेंने|
पेहन के तिरंगे का कवच निकल पड़ा था मैं,सर पर रख के अपने “हिन्दोस्तां” का ताज।
मर मिटूंगा अपने वतन के लिए, चाहे सर क्यों ना कट जाये,फिर भी ना झुकने दूंगा मैं अपने देश का ये ताज।
चल पड़ा था मैं घर से हौंसले बुलंद कर के, उम्मीदों से भरे सपने ले के।