इंसान का जीवन
इंसान का जीवन है एक नाज़ुक बुलबुला,
जो काँपता है चुपचाप, समय के जुए तले धुला।
इंसान हँसी में उठता है, निराशा में गिरता है,
मौन में की गई प्रार्थना में, जीवन का सही अर्थ खोजता है।
जहाँ पहले समय की धारा उसे डुबोती हैं,
फिर काल का प्रवाह उसे नभ की ऊँचाइयाँ दिखलाती हैं।
वह दिन में बिखरता और रात को सँवरता है,
वह टूटकर भी मुस्कुराता,क्योंकि वह हर क्षण में जीता है।
पुराने घर के पीछे, भोर में जब छायाएँ रेंगती है,
एक मानव-सा पौधा झुककर जैसे नींद से उठता है।
पंछी बताते पहाड़ों और नभ की कहानियाँ चुपके से,
सपने जागते वादियों में पौधा की सांसों के साथ धीरे से।
पौधा सुनता रहा, उन पंछियों की बातें को,
धूप की चाह में, हर पल सहता अपनी पीड़ा को।
पौधा बादलों की ओर लपका, काँपते हुए स्वर में,
पर धूल में गिरा, रोते हुए अम्बर की छाँव में।
भूमि ने उसकी वेदना सुनी, पत्थरों को पीड़ा महसूस हुईं,
परंतु माटी के अंदर पोधे की जड़ें अब भी थीं बची हुईं।
पोधे की टूटी हुई आवाज़ें अब भी पानी को पुकारतीं,
उसके अनकहे दिनों और अधूरी कथाओं को सँवारतीं।
पहाड़ियों की बर्फ जब वसंत से हार मानेेंगे,
तब घाटियाँ खुलेंगी, खोए फूल और पंछी फिर गाएँगे।
जड़ों की तरह हर क्षण भी मिट्टी में से उभरेंगे,
और दिन के सनाटों में वह पुनः अपनी आँखें खोलेंगे।
धीरे कदम रखो उस बग़ीचे में, जहाँ सपने बिखरे पड़े हैं,
जहाँ कलियाँ अब भी बंद हैं, पर आंसू अभी सूखे नहीं हैं।
मत छेड़ो उस ख़ामोशी को, मत भूमि को चोट दो,
हर सपने नाज़ुक है, एक आहट से भी राख हो जाए वो।
पर फिर भी आदमी बहता है काल की अनदेखी धारा में,
अब भी थामे हुए अधूरे सपनों को,कहीं धारा के किनारे में।
अब भी देखता है वे पदचिन्ह जो पत्थर को मुलायम करें,
क्योंकि जो गिरे ,वह ही जीवन की समस्याओं से उभरे।