वीर सावरकर: गाथा हिंदुत्व के निर्माता की
वह पूरे हौसले से आगे बढ़ा,
वह हिम्मत कभी न हारा, वह हिम्मत से लड़ा,
उनका राष्ट्रप्रेम असीमित,मन से गुलामी थी अस्विकार,
कालापानी से जगी स्वातंत्र्य की गर्जनरूपि हुंकार।
हिंदुत्व की भावना से भारत माँ की आराधना,
पितृभूमि का आशीर्वाद एकमात्र पुण्य प्राप्ति की साधना,
इस मिट्टी की महक से सबको प्राण मिलता है,
हिंदुत्व का अर्थ सदैव सबको प्रेरित करता है।
पुरानी धरोहर का पाठ पुनः सुनते हैं हम,
सावरकर के मत से हिंदुत्व की पहचान निर्मल।
मातृभूमि, पितृभूमि, पुण्यभूमि सुंदर सपनों की हमारी भारतभूमि,
संस्कृति के साथ सहिष्णुता मानते है हम,हर प्राणी में देखें भगवान को भी।
वीरता, तपस्या और बलिदानो से सजी हुई भारतभूमि,
एक दृढ़ निश्चय की गाथा, एक ऐसे दिलेर व्यक्ति की,
एक नायक की गाथा, फिर भी अनकही।
गाथा एक देशभक्त,एक क्रांतिकारी,एक महान आत्मा की,
विनायक दामोदर सावरकर,गाथा हिंदुत्व के निर्माता की।
नासिक तट के भगूर ग्राम में,
जन्मा एक बालक विनायक दामोदर सावरकर नाम से ।
रामायण से प्रेरित, महाभारत का रणगान सीने में था,
लक्ष्मीबाई की हुंकार,तलवारों की टंकार खून में बहता था।
नाना की ललकार, कुंवर की वीरता का था असर अपार,
बालक सावरकर के मन में भड़क उठा स्वातंत्र्य अंगार।
सोलह की आयु में ली प्रतिज्ञा कठोर,
“अब नहीं सहूंगा यह अन्याय और”।
मित्र मेला में स्वातंत्र्य की मशाल जलाई,
हर युवा की आँखों में आशा समाई।
फिर चला अकेला समुद्र पार,
लंदन की गलियों में लिया क्रांति का भार।
“अभिनव भारत” की क्रांति उठी,
विदेशी वस्त्रों की राख बनी।
स्वदेशी की गूंज, स्वराज का दीप,
उसने बोए स्वातंत्र्य के बीज।
पर सिंह को पिंजरे में कैद किया,
अंग्रेज़ों ने उसे कालापानी में फेंक दिया।
सेलुलर जेल की हर दीवार चीखी,
“यहाँ एक तपस्वी पुरूष साँसें लेता है अभी।”
तेल की कोल्हू में बैल बना दिया,
पर उसकी आत्मा को न थका सके ज़रा भी।
कीलों-काँटों से लिखी कविता,कष्टों में गाया गीत,
हर यातना को बनाया इतिहास का संगीत।
कैदियों को पढ़ाया, उन्हें जीना सिखाया,
उस नर्क में भी स्वर्ग का सपना दिखाया।
”१८५७ का स्वातंत्र्य समर” की गाथा जब उसने लिखी,
हर पंक्ति में आज़ादी की बिजली चमकी।
रिहा हुआ तो थमा नहीं कलम,
समाज में फिर किया असमानता पर वार सनम।
अस्पृश्यता के जंजाल को तोड़ा,
जात-पात के नकाब को चीर फेंका।
अंबेडकर के संघर्ष के बने साथी,
समानता, स्वतंत्रता हर जन की थी थाती।
वीर सावरकर ने मराठी कविता को नया रंग दिया,
छंदों में ताजगी, हर पंक्ति में उमंग दिया।
नवीन विचारों से शब्दों को सजाया,
कविता के आकाश में नया सूरज उगाया।
भाषा की शुद्धता का लिया उन्होंने व्रत,
हर अक्षर में दिखा उनका समर्पण और श्रमरत।
शब्दों के प्रति निष्ठा, जीवन भर निभाई,
साहित्य की धारा को नई दिशा दिलाई।
”हिंदुत्व” की परिभाषा में छिपा था स्वाभिमान,
”छः युगों” पुस्तक में लिखा भारत का गर्वगान।
“हिंदू पद पादशाही” पुस्तक की हुंकार थी गगनभेदी,
अखंड भारत का सपना उसकी लेखनी से बहती।
अंतिम वर्षों में भी तपस्या का व्रत,
स्वेच्छा से त्यागा अन्न, लिया मृत्यु का पथ।
ना रूदन, ना विलाप, ना कोई पछतावा,
जैसे अग्नि स्वेच्छा से समा जाए अग्निकुंड में छाया।
आज वो जेल नहीं, संग्रहालय है,
हर ईंट में उनकी संघर्ष की गूँज सुनाई देती है।
वीर सावरकर केवल नाम नहीं,
एक विचार है, एक साहस है, एक प्राण है कहीं।
उनकी साँसों से बुनता भारत का स्वप्न,
और उनके लहू में लिखा गया स्वतंत्रता का मंत्र।
वे एक नायक नहीं, एक शक्तिपुंज थे,
जिसकी तपिश आज भी इस माटी में पला है।
उनकी विरासत, एक प्रेरक और अमिट कथा है,
जो हर देशभक्त को जुनून और प्रेरणा से भर देती है।