नहीं बनूंगी
कैसा तुम्हारा झूठपे झूठ
कैसा तुम्हारा इये गुस्सा
नहीँ बनना मुझे घरकी लछमी
बंद करो अव इये किस्सा
लौ वनके नहीं जलूंगि
लहरों बनके ना बिखरूंगि
बनना है तो आग बनुंगि
और जलाउंगि सवके गूरुर
लड़के हौ, तो सब पे छूट्
लड़की हौ तो है पिंजरा
छोड़ो वो सव कल् कि बाते
वो दिन अब है गूजरा
बनना है आकाश बनुंगि
जिसके प्रसार की ना सीमा
अब मेरी लाज मेरे हाथों में
अब मैं खुद अपनी जीम्मा
नहीं बनुंगि घर की आंगन
बनना है तूफां ही बनु
घर और युद्ध में चुनना हो
मैं युद्ध का मैदान हि चुनूं.