कितनी मुश्किलों से
।। कितनी मुश्किलों से…।।
कितनी मुश्किलों से
मैंने तुम्हें खोजा–पाया
कितनी मुश्किलों से
प्यार के मिट्टी की
भीत बनाईं
कितनी मुश्किलों से
तुम्हारे लाड़ की
छत चढ़ाई
कितनी मुश्किलों से
इस घर को
हवा-पानी से बचाया
कितनी मुश्किलों से
भसकती हुई भीत पर
बार-बार
प्रेम-सनी मिट्टी
फिर फिर चढ़ाई
कितनी मुश्किलों से
तुम्हारे साज-संवार के लिए
गुलाब-वैजयंती-सेवंती लगाए
कितनी मुश्किलों से
नाज उठाने
तुमको प्रिय
आम-अमरुद-सीताफल लगाये
और
तोड़कर
सबसे पहले
तुम्हें खिलाये
……
……
ओह!
कितनी मुश्किलों से
हम
दो जान से
एक ही परछाईं मैं
सार्थक हो पाये