आदमी का अनकहा संघर्ष
जी-जान से सारा दिन मेहनत करके,
थकान से चकनाचूर हो कर,
चल पड़ा वो अपने घर की ओर।
सुबह मौसम-सी हँसी लेकर,
निकला था अपनी मंज़िल की तरफ़,
आँखों में उम्मीदों की चमक लिए।
मगर शाम ढलते-ढलते,
जोश भी ठंडा पड़ गया,
हँसी की जगह माथे पर
शिकन ने घर कर लिया।
झूठी मुस्कान ओढ़े उसने
गुज़ार दिया सारा दिन,
कभी तो नसीब हो उसे भी
एक सच्ची मुस्कान…