कविता :- डर
हर दफ़ा,
सोचना, फिर कहना !
रूकना, फिर डरना !
डर की कमजोरी को ,
और आगे बढाना !
यही हैं, जो हराता !
बुरी आदत की तरह ,
साये में रहता !
अपनों से अपने हक के लिए !
अपनी आज़ादी के लिए डरना !
हर मुस्कान से पहले,
इजाज़त के वास्तेे डरना !
रोकता आगे बढने से !
कमजोर करता हैं मुझे
कुछ बनने से !
इस डर ने अब तो,
मौन धारण कर लिया !
कुछ कहने से पहले ,
कुछ करने से पहले ,
खामोश कर लिया खुद को !
खुद की पहचान को !