कविता :- डर

हर  दफ़ा,

सोचना, फिर  कहना !

रूकना, फिर  डरना !

डर  की  कमजोरी  को ,

और  आगे  बढाना !

यही  हैं, जो  हराता  !

 बुरी  आदत  की  तरह ,

साये  में  रहता  ! 

अपनों  से  अपने  हक  के लिए !

अपनी  आज़ादी के लिए  डरना  !

हर  मुस्कान  से पहले, 

इजाज़त के  वास्तेे  डरना  !

रोकता आगे  बढने से !

कमजोर  करता  हैं मुझे 

कुछ  बनने  से  !

इस  डर  ने  अब  तो, 

मौन  धारण  कर लिया  !

कुछ  कहने   से  पहले ,

कुछ  करने से पहले  ,

खामोश  कर  लिया  खुद  को !

खुद  की  पहचान  को  !

 

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sumita kanwar