Dhani Chunar
साए में तेरे बरसों का जगा मैं सो जाऊं
तेरी सजती ंसवरती खनक में घर बनाऊं
अपने घर के चांद तारे उतारूं सजाऊं
खु़शबू से भरे रास्तों में खो जाऊं
टूटे बादल के साए में लेहराएगी, मुझस तड़पाएगी, चली जाएगी
धानी तेरी चुनरिया धानी।।
बारिश में धुल के हैं खिलते और निखरते रूप उसके ज़मीनों के चेहरों से मिलते और दमकते
उसके अंदाज़ जैसे मौसम आते जाते
उसके सब रंग हस्ते खिलखिलाते
टूटे बादल के साए में लहराएगी
मुझे तड़पाएगी, चली जाएगी
धानी तेरी चुनरिया धानी।।