मुझे अंदाजा नहीं था
यूँ बिछड़ोगे तुम हम से, अंदाजा नहीं था।
मर गये तेरे जाने से, बस ज़नाज़ा नहीं था।
कहाँ दरखास्त देते, कहाँ अर्ज हम करते
खुलता जो तेरे घर में, वो दरवाज़ा नहीं था।
गिले शिकवे जो होते, तो हम कैसे करते।
अजनबियों से अरे अब तकाज़ा नहीं था।
मुद्दतें हुयी है बिछड़े, न कोई तस्कीन पाई
भुगतान जो न हो मैंने, कोई खमियाजा नही था।
चाहता तो बात करता, चीखता मैं भी तुम पे
करु क्या शख्स मेरे अंदर बे लिहाज़ा नही था।
सुरिंदर कौर