दर्द
चलते चलते विरान राहों पर, कोई आता है,
शरीर को छोड़,
रूह को नोच खाता हैं,
आंखों से जैसे लहू टपकता है,
जिंदा रहकर भी यह शरीर मर जाता है,
चलते चलते विरान राहों पर, कोई आता है,
इंसाफ का गला घोंट,
वो आज़ाद हो जाता है,
वो टुट कर अंदर से बिखर जाती है,
यही शर्मिंदगी उसे हर वक्त सताती है,
राहें भी सुनसान थरथराती हैं, हर बार ऐसी ही कोई बेटी, चलते चलते इन राहों पर मर जाती हैं.