Likhu ya na likhu
लिखूं या ना लिखूं।।
और लिखूं तो क्या लिखूं
लिखूं उन चीखों को जो कोई सुन ही नहीं रहा या लिखूं रोज मिल रही सीखों को ।।
लिखूं किसी की लाचारी को या फिर हर दूसरी बेटी बेचारी को।।
लिखूं मै गलती उसके लिबास की या फिर लखूं कहानी बे लिहाज की
लिखूं मै द्रौपदी की लाज को या लिखूं फिर इस घटते आज को।।
लिखूं मैं हरण सीता का या फिर लिखूं वर्णन काली का।।
लिखूं मै गाथा बलात्कारी की या फिर लिखूं मै व्यथा बेबस नारी की।।।