गिलहरी
“अरे, ये बस्ता तो उतारो, देखो ट्रेन छूट जाएगी! कुल्टा, तुम मेरी सुनती क्यों नहीं हो? बाद में मिल लेना अपनी सहेलियों से। कहीं ऐसा न हो कि ये ट्रेन हमें छोड़कर निकल जाए।”
रामदीन की बात सुनते ही कुल्टा की सारी सहेलियाँ खिलखिलाकर हँस पड़ीं।
“रामदीन जी,” एक सहेली ने मुस्कराते हुए कहा, “ये तो बताइए, आपको नाम से बुलाएँ या ‘जीजू-जीजू’ कहें?”
इतना सुनना था कि फिर एक बार सबकी हँसी छूट गई।
कुल्टा का विवाह अभी एक महीने पहले ही लखनऊ में हुआ था। माँग में सजा सिंदूर, गले में सुनहरी धातु का मंगलसूत्र और पैरों में छनकती पायल—जब भी वह चलती, उसकी पायल की छन-छन जैसे उसके चंचल मन का परिचय दे देती। सचमुच, वह बड़ी मनमोहक लग रही थी।
“अरे, ज़रा चाय तो बना लाओ,” रामदीन ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “इतने में मैं भी अपनी सालियों से दो-चार बातें कर लूँ। वैसे भी तुम मुझे किसी लड़की से बात ही कहाँ करने देती हो।”
कुल्टा पलटकर खड़ी हो गई।
“क्यों भई? उन चुड़ैलों की तरफ़ नज़र भी उठाई तो देख लेना।”
“क्या देख लेना?” रामदीन ने आँखों में शरारत और चेहरे पर मासूमियत लाते हुए पूछा।
कुल्टा मुस्कुरा तो रही थी, पर मन ही मन शर्मा भी गई। रामदीन की वही शरारती आँखें जाने क्यों बार-बार उसके मन में उतरती जा रही थीं।
रसोई में प्याज़ काटते हुए उसका ध्यान भटक गया।
“आह…”
चाकू उसकी उँगली पर लग गया। लाल रक्त की एक पतली धारा उभर आई।
रामदीन दौड़कर आया। उसने बिना कुछ कहे उसका हाथ अपनी हथेलियों में थाम लिया, नल के नीचे धीरे-धीरे घाव साफ़ किया और अपनी रूमाल की पट्टी बाँधते हुए बोला, “इतनी जल्दी भी क्या है? ज़रा मेरा भी ख़याल कर लिया करो। तुम्हें चोट लगती है तो दर्द मुझे होता है।”
कुल्टा ने हल्की मुस्कान के साथ उसकी ओर देखा। उस पल दोनों की आँखों में शब्दों से कहीं ज़्यादा बातें थीं।
रात को सब लोग खाने की मेज़ पर बैठे। हँसी-मज़ाक का सिलसिला चल ही रहा था कि अचानक कुल्टा के मुँह का निवाला गले में अटक गया।
कविता ने धीमी आवाज़ में कहा, “राधा का विवाह हो गया… लेकिन वह पगफेरे पर भी नहीं आई। सुना है उसके पिता ने पैसों के लालच में उसका ब्याह जबरन कर दिया।”
चंबल के इलाके में ऐसी घटनाएँ नई नहीं थीं, फिर भी राधा का ख़याल कुल्टा के भीतर कहीं गहरे उतर गया।
अगली सुबह कुल्टा राधा के घर पहुँची। घर क्या था—बस एक छोटा-सा कमरा।
अंदर कदम रखते ही सीलन और बदबू का तेज़ झोंका उसकी साँसों से टकराया। उसने घबराकर अपना दुपट्टा नाक पर रख लिया। कमरे में अजीब-सी वीरानी पसरी हुई थी।
कुछ कदम आगे बढ़ते ही उसके पैर जैसे ज़मीन से चिपक गए।
राधा को देखकर उसका दिल बैठ गया।
वह बेहद कमज़ोर, घायल और टूटी हुई अवस्था में चुपचाप पड़ी थी। उसके शरीर पर हिंसा के निशान साफ़ दिखाई दे रहे थे, और पूरे कमरे में उपेक्षा, पीड़ा और असहायता का सन्नाटा फैला हुआ था।
“राधा…”
कुल्टा उसके पास घुटनों के बल बैठ गई और उसे अपने सीने से लगा लिया। दोनों की आँखों से आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। अभी एक महीने पहले तक जो दो सहेलियाँ भविष्य के सपने देख रही थीं, आज उनमें सेराधा ने पूछा,
“दीदी, क्या पुरुष जात राक्षस है, जो चीखने-चिल्लाने पर भी
नोच डालती है हमारा अस्तित्व?
जो नहीं पूछती हमारी रज़ामंदी और धकेल देती है हमें अँधेरे
कमरे में अपनी प्यास बुझाने?
क्या दो पल को नहीं याद आती उन्हें उनकी माँ, बहन या बेटी?
यह देश कितनी तरक्की कर गया, दीदी, पर आज तक नहीं बचा
पाया हमें उन अपराधियों से,
जो सात फेरे लेकर छीन लेते हैं हमारी आज़ादी, लूट लेते हैं
हमारी इज़्ज़त,
मार डालते हैं हमारी आत्मा, और फूँकते हैं बीड़ी में अपना गुरूर।”
मैं हैरान थी। चंचल में बाली उम्र में विवाह होना आम बात थी,
पर यह तन और मन की दशा, जो मेरे प्रत्यक्ष थी,
यह तो कभी मैंने अख़बारों के गुमनाम पत्रों में भी नहीं पढ़ी।
आँखें कुटिल अग्नि लिए लाल, चेहरे पर नीले निशान,
सीने पर बीड़ी जले दाग,
चलती तो दर्द में कराहती राधा,
और अंतस से निकलती, पैरों के सहारे बहती रक्त की तीन पंक्तियाँ।
रात हो चुकी थी। मैंने दरवाज़ा खटखटाया।
मेरे पति आँगन में बैठे कुछ पढ़ रहे थे।
वे उठे और दरवाज़ा खोल दिया।
आज नहीं पूछा मैंने उनका हाल,
आज नहीं रखी मैंने पतीले में चाय।
मैं सब छोड़कर कमरे में आ गई
और बंद कर लिया ख़ुद को,
जैसे राधा करती है अपने आप को कैद,
जब उसका पति नशे में धुत करता है ज़बरदस्ती, राधा माँगती होगी दुहाई
और वह उसे बालों से पकड़ ले जाता होगा, अपनी कामुक आग बुझाने।
उस दिन मैंने एक नहीं, कई कविताएँ लिखीं
और फाड़ दिए पुराने पन्ने—
वे पन्ने, जिन्हें नहीं थी मालूम यह वास्तविकता, यह हक़ीक़त। एक की ज़िंदगी मानो किसी ने बेरहमी से छीन ली थी।