रुकना मना है — एक प्रेरणादायक कविता **लेखक:** अखिलेश जैन
### रुकना मना है
कल जब मैंने नींव रखी थी, साथ सिर्फ विश्वास था,
मंज़िल तो थी सामने, पर कठिन नया आकाश था।
सीखा हर दिन नया सबक़, हर ठोकर ने कुछ सिखाया है,
जो न बन पाया काम कभी, नया रास्ता अपनाया है।
धैर्य की खातिर रुकना पड़ा, जब राहें उलझ सी जाती थीं,
पर उम्मीदें मेरी हरदम, खुद को फिर से दोहराती थीं।
बीज बोया है तो यकीनन, एक दिन वह वृक्ष बनेगा,
समय की गति से ही तो, हर फूल सजीला खिलेगा।
मेरे हाथ में जो नहीं है, मैं उन पर ध्यान न देता हूँ,
जो है मेरे बस में सब कुछ, उस पर पूरा ज़ोर लगाता हूँ।
गिरना-संभलना खेल है जीवन का, मैं फिर से उठ जाता हूँ,
रुकना मेरी फितरत नहीं, बस चलता ही मैं जाता हूँ।
कल फिर एक नई भोर होगी, नई किरणें मुस्काएंगी,
आज की जो मेहनत है मेरी, कल रंग बहुत लाएंगी।