अध्याय – 1
वृंदावन से पहली मुलाकात – जहाँ आत्मा को सुकून मिलता है
सच कहूँ तो वृंदावन जाने से पहले वृंदावन के बारे में मुझे कुछ विशेष ज्ञान नहीं था। ज्ञान कहना भी शायद बड़ी बात होगी, मुझे तो ठीक से जानकारी तक नहीं थी। हाँ, बचपन से सुनते आए थे कि कान्हा जी वहीं के हैं, उनकी बाल लीलाओं की, उनकी प्रेम लीलाओं की भूमि वही है। राधा रानी का नाम वहीं गूँजता है। बस यही दो-चार सुनी-सुनाई बातें मन में थीं, जो हर हिंदू के मन में होती हैं।
पर वृंदावन क्या है? वृंदावन का अर्थ क्या है? उसकी मिट्टी में ऐसा क्या है कि जो एक बार वहाँ जाता है, वो लाख कोशिशों के बाद भी वहाँ से लौट नहीं पाता? उसका मन वहीं रह जाता है? और वो लगाव, वो खिंचाव, वो प्रेम जो वृंदावन सबसे कर लेता है, वो कैसा होता है? ये सब तो मुझे वहाँ जाने के बाद ही पता चला। किताबों में पढ़ कर नहीं, वहाँ की हवा में साँस लेकर पता चला।
फिर वो दिन आया, जिसका मुझे पता नहीं था कि मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत दिन बन जाएगा। मैं अपने पूरे परिवार के साथ पहली बार वृंदावन के लिए निकली।
रास्ते भर मन में एक अजीब सी उत्सुकता थी, एक बचपने जैसा उल्लास। जैसे किसी अपने से मिलने जा रही हूँ, जो बरसों से मेरा इंतजार कर रहा है। और जैसे ही हमने वृंदावन की सीमा में प्रवेश किया, हवा ही बदल गई। सच मानिए, हवा बदल गई थी। शहरों की घुटन, शोर, भाग-दौड़ — सब पीछे छूट गया। वहाँ की हवा में इत्र नहीं, प्रेम घुला था। हर तरफ एक ही धुन — राधे-राधे। कोई आपको धक्का भी देगा तो बोलेगा – राधे-राधे। कोई रिक्शा वाला भी बुलाएगा तो कहेगा — आओ, राधे-राधे।
मैंने सोचा था वहाँ भीड़ होगी, शोर होगा, धक्का-मुक्की होगी, जैसा अक्सर बड़े तीर्थों में होता है। पर यहाँ तो भीड़ में भी शांति थी। शोर में भी संगीत था। लोग भाग नहीं रहे थे, नाच रहे थे। किसी के चेहरे पर थकान नहीं, सिर्फ एक अजीब सा नशा था — भक्ति का नशा, प्रेम का नशा।
उस पहली यात्रा में मैंने क्या-क्या नहीं देखा।
सबसे पहले हम बांके बिहारी जी के मंदिर गए। वहाँ की भीड़, वहाँ का शोर, पंडित जी की आवाज, और पर्दे के पीछे से झाँकते वो नटखट बिहारी जी… ऐसा लगा जैसे वो मुझे ही देख कर मुस्कुरा रहे हों। आँखों से आँसू कब निकल गए, पता ही नहीं चला। वो दर्शन नहीं, मिलन था।
उसके बाद राधा रमण जी , जहाँ शांति ऐसी कि दिल की धड़कन तक सुनाई दे। फिर अष्ट सखियों के मंदिर , जहाँ ऐसा लगा जैसे राधा रानी अपनी सखियों के साथ आज भी वहीं बैठी हों, हमारा इंतजार कर रही हों। मैंने अनगिनत छोटे-बड़े मंदिरों में शीश झुकाया। हर मंदिर की अपनी कहानी थी, अपनी महक थी। कहीं कीर्तन चल रहा था, कहीं कोई मीराबाई की तरह रो-रो कर भजन गा रहा था।
हर दर्शन के साथ मन हल्का होता जा रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे मन पर जो-जो बोझ थे, जो चिंताएँ थीं, जो थकान थी — वो वृंदावन की गलियों में कहीं गिरती जा रही हैं। और फिर आई यमुना जी की बारी। शाम का समय था। हमने परिवार के साथ यमुना जी में नौका विहार किया। नाव धीरे-धीरे चल रही थी, पानी काला-काला पर उसमें भी एक चमक थी। ठंडी हवा चल रही थी और नाव पर बैठे हम सब खूब हँस रहे थे, बातें कर रहे थे, फोटो ले रहे थे। पर उस हँसी-मजाक के बीच भी एक गहरा सुकून था। मैंने यमुना जी की लहरों को देखा तो ऐसा लगा जैसे वो लहरें नहीं, कोई सदियों पुरानी कहानी सुना रही हों — कान्हा और राधा की कहानी, प्रेम और इंतजार की कहानी।
उस पल मुझे पहली बार एहसास हुआ — वृंदावन घूमने की जगह नहीं है। ये तो महसूस करने की जगह है। ये वो जगह है जहाँ आप सुकून ढूँढने नहीं जाते, सुकून खुद आपको ढूँढ लेता है।
उस दिन, इतनी छोटी सी उम्र में, मुझे पहली बार लगा जैसे मैंने मोक्ष पा लिया हो। जैसे मुझे वो सब मिल गया हो जो लोग उम्र भर ढूँढते हैं। पैसा, शोहरत, भीड़ — सब छोटा लगने लगा उस शांति के सामने जो वृंदावन ने मुझे एक ही दिन में दे दी थी।
उस दिन वृंदावन ने मुझे घुमाया नहीं था…
उस दिन वृंदावन ने मुझे अपनाया था। और हमेशा के लिए अपना बना लिया था।
उसी भाव पर मेरी एक छोटी सी कविता
मैं अनजान थी, न जानती थी भेद सारा,
बस सुना था, वहीं बसता है कान्हा प्यारा।
जब कदम रखा तो जाना, ये धाम नहीं, धड़कन है,
जहाँ आकर हर बिखरा हुआ मन, फिर से लगता है।
यहाँ भीड़ में भी एक सुकून है, शोर में भी गीत है,
यहाँ जो एक बार आया, समझो उसी की जीत है।