अध्याय -10
टटिया स्थान – जहाँ कलियुग आज तक प्रवेश नहीं कर पाया
एक सप्ताह बीत गया। फिर से वही प्रतीक्षा थी — छुट्टी की। फिर समाचार मिला कि वही यात्रा-गाड़ी फिर जाने वाली है। इस बार कहा गया कि गाड़ी बरसाना जाएगी। सुनकर मन प्रसन्न हो गया। फिर बाद में पता चला कि वह बरसाना नहीं, वृंदावन जा रही है। पर हमारे लिए तो दोनों ही एक समान थे। वृंदावन हो या बरसाना — नाम सुनते ही हम पागलों की तरह उछल पड़े।हमने तुरंत अपनी जगह सुरक्षित कर ली और तैयारी आरंभ कर दी। अगले दिन छुट्टी थी, तो हमने निश्चय किया कि आज ही निकलना है। अपना कार्य पूरा करने के पश्चात हम उसी गाड़ी से निकल पड़े।उस दिन एकादशी थी।
इसलिए वृंदावन में अत्यधिक भीड़ थी। हम वृंदावन पहुँचे तो अवश्य, पर बहुत देर से। भीड़ के कारण चालक ने गाड़ी वृंदावन से बहुत दूर रोक दी। इसलिए हमें बहुत पैदल चलना पड़ा।इस बार हमारे मन में एक ही इच्छा थी — यदि वृंदावन गए तो टटिया स्थान अवश्य जाएँगे।टटिया स्थान के बारे में हम अधिक नहीं जानते थे। केवल इतना सुना था कि यह कलियुग में वह एकमात्र स्थान है, जहाँ कलियुग आज तक प्रवेश नहीं कर पाया है। इसी कारण वहाँ जाने की उत्सुकता और भी बढ़ गई थी। हमने लोगों से मार्ग पूछा और जैसे-तैसे करके टटिया स्थान पहुँच ही गए।वहाँ पहुँच कर जो देखा, वह अद्भुत था।
पहली दृष्टि में वह किसी छोटे से गाँव जैसा लगा, इतना प्यारा, इतना सरल। चारों ओर केवल दीपक जल रहे थे, कहीं कोई बिजली की चकाचौंध नहीं, कोई आधुनिकता नहीं। लोग आज की इस दौड़-भाग से बहुत दूर, पुराने समय की तरह जीवन जी रहे थे। उसे देख कर ऐसा लगा जैसे समय वहीं ठहर गया हो। मन को बहुत आनंद आया।फिर हम भीतर मंदिर की ओर गए। भीतर कान्हा जी की एक बहुत सुंदर प्रतिमा थी, जिसके सामने एक छोटा सा दीपक जल रहा था और चारों ओर घना अंधेरा था। उसी अंधेरे में वह दीपक और वह मूर्ति और भी अधिक दिव्य लग रही थी। वहाँ उस समय आरती चल रही थी। हम भी उस आरती में सम्मिलित हो गए।आरती समाप्त होने पर हमने प्रसाद लिया और थोड़ा वहाँ घूम कर देखा। वहाँ चलदूरभाष यंत्रों का प्रयोग वर्जित था। सब बंद था, और इसी कारण वहाँ की शांति और भी गहरी लग रही थी।वहाँ से निकलने के बाद समस्या फिर वही थी। वृंदावन में भीड़ इतनी थी कि गाड़ी तक पहुँचने के लिए कोई वाहन नहीं मिल रहा था। हमने सोचा, केलीकुंज आश्रम चले जाते हैं।
पर केलीकुंज जाने के लिए भी कोई गाड़ी नहीं मिली और वह स्थान वहाँ से बहुत दूर था। तो हम पैदल ही निकल पड़े।बस चलते जा रहे थे, चलते जा रहे थे। हमें यह भी नहीं पता था कि मार्ग किधर है। पर चलते-चलते ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे हमने अनायास ही वृंदावन की परिक्रमा कर ली हो। आनंद आ रहा था, थकान का अनुभव ही नहीं हो रहा था। उस समय साढ़े आठ बज चुके थे, नौ बजे हमारी गाड़ी वहाँ से निकलने वाली थी। पर इसे कान्हा जी की लीला ही कहिए कि हमें समय पर गाड़ी मिल गई।
फिर हम वहाँ से गोवर्धन परिक्रमा के लिए निकले। गाड़ी चल पड़ी।
हमारे कुछ सहकर्मी हमसे थोड़े रुष्ट थे, किन्हीं बातों को लेकर थोड़ा मनमुटाव हो गया था। फिर भी हम आगे बढ़े।परिक्रमा में भीड़ बहुत अधिक थी। इसलिए हम सब अलग-अलग हो गए। वहाँ किसी के चलदूरभाष यंत्र में संकेत भी नहीं आ रहा था, जिससे एक-दूसरे से संपर्क करना कठिन था। फिर भी हमने सफलतापूर्वक परिक्रमा पूरी कर ही ली। उसके पश्चात हम सब एक-दूसरे से मिले। हमने गिरिराज जी का आशीर्वाद लिया और फिर कुछ चाय-पान के लिए रुके।किसी तरह हम अपनी गाड़ी तक पहुँचे। उसके बाद हमारा गंतव्य था निधिवन और रमण रेती।हम रमण रेती गए। वहाँ हमने स्नान किया।
वहाँ की कोमल रेत में हम थोड़ा खेले भी और बहुत आनंद आया।लौटते-लौटते संध्या हो चुकी थी। अब हम बहुत थक चुके थे, क्योंकि हमने परिक्रमा भी की थी, बहुत सी वस्तुएँ भी खरीदी थीं, और बहुत से स्थानों के दर्शन भी किए थे।
पर थकान के बाद भी मन में जो आनंद था, वह अवर्णनीय था। इस बार की हमारी यात्रा कुछ ऐसी ही रही।