अध्याय- 11
बेलवन की वह रात जब दर्शन नहीं हुए
अब की बार फिर से मन में वृंदावन जाने की इच्छा जागी थी, पर अब की बार हम यात्रा-गाड़ी से बहुत परेशान हो चुके थे। वह गाड़ी एक-एक व्यक्ति के लिए रुकती थी, बहुत समय लेती थी। मार्ग और लंबा हो जाता था। थकान और बढ़ जाती थी।तो हमने सोचा, अब की बार हम उस गाड़ी से नहीं जाएँगे।
अब की बार हम स्वयं ही जाएँगे, जैसे हम पहले हमेशा जाया करते थे।हमने अपना कार्य पूरा किया और छुट्टी की प्रतीक्षा की। जैसे ही छुट्टी मिली, हम निकल पड़े वृंदावन के लिए।इस बार भी हम वृंदावन पहुँचे तो वही समय हो रहा था — रात के बारह-एक बजे। पहुँचते ही हमने वृंदावन की परिक्रमा की। रात की वह परिक्रमा, वह शांति, वही राधे-राधे की ध्वनि — सब वैसा ही था।परिक्रमा के पश्चात हम गए केलीकुंज आश्रम के पास। वहाँ हमारा मन था कि महाराज जी के दर्शन हों।हम वहाँ पहुँचे और बहुत देर तक प्रतीक्षा की। बहुत देर तक बैठे रहे।
फिर पता चला कि महाराज जी वहाँ दर्शन नहीं दे रहे हैं, वे इस समय बेलवन में दर्शन दे रहे हैं।सुनकर हम थोड़े भ्रम में पड़ गए। मन में एक शंका भी आई। बहुत देर तक हम सोचते रहे, समझते रहे। बहुत देर हो गई।फिर हमने निश्चय किया कि जहाँ वह दर्शन दे रहे हैं, हम वहीं जाएँगे — बेलवन।हमने वहाँ से एक गाड़ी आरक्षित की। हमारे साथ दो व्यक्ति और थे, वे दिल्ली से आए हुए थे। हम सब मिलकर बेलवन के लिए निकल पड़े।मार्ग बहुत सुनसान था। घना जंगल था। बेलवन केलीकुंज के पीछे स्थित एक सघन एकांत वन-क्षेत्र है, जहाँ महाराज जी कभी-कभी रात्रि में दर्शन देते हैं। स्थानीय जन उसे बेलवन ही कहते हैं। वहाँ पहुँचते-पहुँचते मन में थोड़ा भय भी लग रहा था। चारों ओर अंधेरा, सुनसान रास्ता, और जंगल की नीरवता।और उस पर जो चालक था, उसने मदिरा पी रखी थी। यह देखकर मन को बहुत कष्ट हुआ। हम तो यही मानते हैं कि ब्रजवासी को तो कभी भी ऐसे पेय का सेवन नहीं करना चाहिए, यह ब्रज की मर्यादा के विरुद्ध है। पर हमने कुछ नहीं कहा और बेलवन की ओर आगे बढ़ते रहे।आधा-पौन घंटा चलने के बाद जब हम बेलवन पहुँचे, तो देखा कि वहाँ से सारे वाहन वापस लौट रहे हैं। जो लोग बेलवन में दर्शन के लिए गए थे, वे सब लौट रहे थे। पूछने पर पता चला कि आज बेलवन में भी महाराज जी के दर्शन नहीं हो रहे हैं।सुनते ही हृदय टूट गया।
इतनी दूर, इतनी कठिनाई से, इतनी आशा लेकर बेलवन तक आए थे, और दर्शन ही नहीं हुए। हम सब बहुत दुखी हो गए।दुखी मन से हम बेलवन से वापस लौटने लगे, तभी हमारी गाड़ी खराब हो गई।अब कष्ट और बढ़ गया। उस सुनसान बेलवन के मार्ग में गाड़ी खराब। हमने बहुत प्रयास किया। धक्का देकर, धक्का देकर, बड़ी कठिनाई से, बहुत दूर से हम उस गाड़ी को किसी तरह बेलवन से वृंदावन के भीतर तक ले कर आए। बहुत तकलीफ हुई, बहुत कष्ट हुआ। शरीर थक चुका था, मन थक चुका था।
उस रात बेलवन में हमारी सारी हिम्मत टूट गई। हम बहुत थक चुके थे, बहुत दुखी थे।हमने थोड़े-बहुत वस्त्र खरीदे और बस सुबह होने की प्रतीक्षा करने लगे कि सुबह हो और हम यहाँ से निकल जाएँ। फिर भी मन में एक लोभ था, एक आशा थी — काश, सुबह बेलवन में या केलीकुंज में महाराज जी के दर्शन हो जाएँ। पर नहीं हुए।सुबह हुई, हमने थोड़ी चाय पी और भारी मन से बेलवन की उस अधूरी यात्रा को मन में लेकर अपने घर के लिए निकल पड़े।अब की बार की यात्रा ऐसी ही रही — बेलवन तक जाकर भी बिना दर्शन के लौटना पड़ा, पर एक बड़ी सीख दे गई। वृंदावन हर बार दर्शन नहीं देता, कभी-कभी वह प्रतीक्षा करवाता है। और बेलवन की वही प्रतीक्षा ही तो प्रेम की परीक्षा है।