अध्याय – 2
दूसरी बार वृंदावन – जब दुनिया की परवाह छोड़ कर मैं फिर से उसके पास गई
पहली बार वृंदावन से लौटने के बाद कुछ भी पहले जैसा नहीं रहा।
पहली यात्रा में जो शांति मैं वृंदावन में छोड़ आई थी, वह शांति अब मुझे यहाँ कहीं नहीं मिल रही थी। मन वहीं अटका हुआ था, वहीं की गलियों में, वहीं यमुना जी के किनारे। और शायद यही कारण था कि नियति ने मुझे वृंदावन के और निकट ला दिया। मेरा कार्यस्थल बदल चुका था, अब मैं वृंदावन के समीप ही रहने लगी थी।
अब वृंदावन दूर नहीं था। जब भी अवकाश मिलता, मेरे पग स्वयं ही उसी ओर मुड़ जाते। एक आदत सी लग गई थी। ऐसा लगता था जैसे कोई भीतर से पुकार रहा हो — आ जाओ।
उस समय मेरे कुछ सहकर्मी ऐसे मिले, जो सच में बिहारी जी के और श्री प्रेमानंद जी महाराज के बहुत निकट थे। वे केवल नाम के भक्त नहीं थे, वे राधा रानी की भक्ति में पूर्ण रूप से लीन थे। हर बात में राधा नाम, हर श्वास में राधा नाम। वे मुझे भी समझाते — ऐसा करना चाहिए, वैसा करना चाहिए, नाम जप करना चाहिए। वे प्रायः वृंदावन आते-जाते रहते थे।
एक दिन मैंने साहस करके उनसे कहा – यदि मैं भी आप लोगों के साथ चलूँ तो ? बात निश्चित हो गई। हमने सात लोगों का एक समूह बनाया। सब बहुत उत्साहित थे। पर जाने से ठीक पहले सबके बहाने आरंभ हो गए। एक-एक करके सबने मना कर दिया। अंत में बचे केवल दो लोग — मैं और मेरे एक सहकर्मी।
अब मेरे मन में एक और द्वंद्व आरंभ हो गया। लोग क्या सोचेंगे? एक कन्या, एक पुरुष सहकर्मी के साथ वृंदावन जा रही है? समाज क्या कहेगा?
उन्होंने भी मेरी उलझन देखी और कहा, “रहने दीजिए, आप मत चलिए।”उनकी यह बात मेरे हृदय में चुभ गई। मैंने सोचा -एक व्यक्ति की सोच के लिए, समाज के भय से, मैं वृंदावन न जाऊँ? मैं कान्हा जी से न मिलूँ? नहीं। मुझे जाना है। और मैं उनके साथ वृंदावन के लिए निकल पड़ी।
हम रात्रि में बहुत विलंब से वृंदावन पहुँचे और सीधे पहुँचे – श्री हित राधा केली कुंज, जहाँ प्रेमानंद जी महाराज के दर्शन होते हैं। जैसे ही वृंदावन के द्वार के भीतर गई, ऐसा लगा जैसे जो शांति मैं एक माह पूर्व यहाँ छोड़ कर गई थी, मैं वापस उसी शांति के पास आ गई हूँ। मैं घर आ गई हूँ।
हमने पंक्ति में स्थान ले लिया। रात्रि के बारह बज रहे थे और उनके दर्शन प्रातः छह बजे होने थे।
मैंने सोचा – हे भगवान, यह पूरी रात खुले आकाश के नीचे, भूमि पर पन्नी बिछा कर कैसे व्यतीत होगी ? पर वहाँ देखा तो लाखों की भीड़ थी। कोई सो रहा था, कोई राधा-राधा जप रहा था, कोई नेत्र बंद करके केवल प्रतीक्षा में था। उन सबको देख कर मुझे भी धैर्य मिला। पूरी रात मैं अपनी उस छोटी सी पन्नी को कभी इधर खिसकाती, कभी उधर। कभी बैठती, कभी लेटती, बस उनकी प्रतीक्षा करती रही। और फिर वह क्षण आया।
सुबह होने से पहले ही हलचल आरंभ हो गई। सभी लोग उठ कर बैठ गए। एक साथ, एक ही स्वर में — राधा नाम का जाप गूँजने लगा। पूरा वातावरण राधामय हो गया। और जैसे ही वे आए… मेरी दृष्टि उनसे हटी ही नहीं।
मैंने देखा, उनके आते ही सारे लोग रोने लगे। फूट-फूट कर रोने लगे। मैं आश्चर्यचकित थी — आज के समय में एक मनुष्य के लिए कौन रोता है? वे तो भगवान भी नहीं हैं, मनुष्य ही तो हैं। फिर क्यों? क्यों इतने लोग एक झलक के लिए रात-रात भर बैठे हैं और देखते ही रो पड़ते हैं?
उसी क्षण मुझे पहली बार अनुभव हुआ — इस मनुष्य में कुछ तो विशेष बात है। कुछ तो गुण है जो हमें दिखाई नहीं दे रहा, पर इन लाखों लोगों को दिखाई दे रहा है।
वह तेज, वह मुस्कान, वह नेत्रों में करुणा… वे मनुष्य नहीं, साक्षात प्रेम का रूप लग रहे थे। मेरे हाथ काँप रहे थे, पर मैंने तुरंत अपना दूरभाष निकाला और उनका चलचित्र बना लिया। मन में एक ही बात थी — मुझे इन्हें अपनी इन आँखों से भी देखना है, और यंत्र में भी संजो कर रखना है। और सत्य कहूँ तो उसी दिन से मेरे भीतर एक परिवर्तन आरंभ हुआ। धीरे-धीरे मैंने वृंदावन में रुचि लेनी आरंभ की, प्रेमानंद जी महाराज में रुचि लेनी आरंभ की, राधा नाम जप में रुचि लेनी आरंभ की। मैं उनकी बातें सुनने लगी। वे हर बार एक ही बात सिखाते थे — _नाम जप करो, नाम जप करो, राधा नाम जपो।_
मैंने देखा, शोभरी वन के बाहर जाप-गणक यंत्र ही यंत्र रखे हैं, और खूब बिकते हैं। सबके हाथ में वही यंत्र, सब दिन भर राधा-राधा जपते रहते हैं। यह दृश्य मुझे बहुत सुंदर लगा। और वृंदावन की एक और विशेषता जिसने मेरा हृदय जीत लिया — वहाँ सब एक-दूसरे को राधा कहते हैं।
राधे-राधे, राधे कहाँ जाना है? राधे क्या करना है? राधे कैसे हो? अर्थात, वे एक-दूसरे में राधा रानी को खोजते हैं, एक-दूसरे में राधा रानी को देखते हैं। यह बात मुझे वहाँ की सबसे अच्छी लगी।
प्रेमानंद जी महाराज आए, दो क्षण भी नहीं रुके, एक झलक दी और अचानक से चले गए। और उनके जाते ही… लाखों की भीड़ एक साथ निकलने लगी। हम भी उस भीड़ के साथ पैदल-पैदल चलने लगे। इतनी भीड़ थी कि मार्ग पर कोई वाहन कुछ नहीं मिल रहा था। हम बस चले जा रहे थे, उनके पीछे, उसी धुन में।
उस दिन हमने और कोई दर्शन नहीं किया। मन ही नहीं था। क्योंकि हमने प्रेमानंद जी को देख लिया था, हमारा हृदय उसी से तृप्त हो गया था। हम सीधे अपने घर की ओर चले गए।
मार्ग भर मैंने बहुत सारे चलचित्र बनाए, बहुत सारे साझा किए। बहुत सारे लोगों ने पूछा भी — क्या आप सच में उनसे मिले हैं? मैंने कहा — हाँ। और तब जो प्रसन्नता हो रही थी… वह प्रसन्नता मैं बता नहीं सकती। इतनी प्रसन्नता थी कि शब्द भी कम पड़ जाएँ।
उसी भाव पर मेरी एक कविता
जब वे आए तो देखा, सबके नयन रो पड़े,
मैं सोचती रही, एक मनुष्य के लिए यह कैसी दीवानगी बड़ी।
फिर समझ आया, वे मनुष्य नहीं, राधा नाम की लौ हैं,
जहाँ सब एक-दूसरे में राधा को देखें, वृंदावन वही ठाँव है।