अध्याय – 3
जब मन वृंदावन में ही रह गया
वृंदावन से लौटने के बाद ऐसा लगा जैसे शरीर तो यहाँ लौट आया है, पर मन वहीं छूट गया है। वहीं, राधा केली कुंज की उस भीड़ में, उस खुले आसमान के नीचे, उस पन्नी पर।
उस दूसरी यात्रा के बाद सब कुछ बदल गया था। पहली यात्रा में वृंदावन ने सुकून दिया था, पर दूसरी यात्रा में वृंदावन ने तो जैसे मन ही चुरा लिया था। वो सुकून अब चोरी हो गया था और चोर वहीं वृंदावन में बैठा मुस्कुरा रहा था।
अब आँख बंद करती तो सामने प्रेमानंद जी महाराज का वो तेजस्वी, करुणा से भरा हुआ चेहरा दिखता। वो हल्की सी मुस्कान, वो आँखों में अथाह प्रेम। और कान में गूँजता तो सिर्फ एक ही नाम — राधे-राधे, राधे-राधे।
अब मन यहाँ लगता ही नहीं था। हम जहाँ रहते थे, वहाँ रहते हुए भी ऐसा लगता था जैसे हम वहाँ हैं ही नहीं। ये शरीर तो यहाँ है, ऑफिस में काम कर रहा है, लोगों के बीच बैठा है, हँस रहा है, बोल रहा है, पर मन? मन तो अब भी वृंदावन की उन तंग गलियों में घूम रहा है। कभी बाँके बिहारी की गली में, कभी यमुना जी के किनारे, कभी उस रात वाली लाइन में।
वृंदावन की वो भीड़, वो लाखों लोगों का एक साथ राधा नाम जपना, वो जमीन पर पन्नी बिछा कर पूरी रात किया गया इंतजार — सब कुछ आँखों के सामने चलचित्र की तरह घूमता रहता था। नींद में भी, जागते हुए भी। और फिर धीरे-धीरे, मुझे खुद में एक अजीब सा बदलाव महसूस होने लगा। एक ऐसा बदलाव जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।
मन खुश रहने लगा। बिना किसी वजह के। अकारण ही। पहले छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आ जाता था, चिड़चिड़ापन हो जाता था, बात-बात पर रोना आ जाता था। अब किसी के चिल्लाने पर भी फर्क नहीं पड़ता था। कोई कुछ भी कह दे, कोई कितना भी सुना दे, मन कहता — कोई नहीं, जाने दो। राधे-राधे।
पहले जहाँ हर बात दिल पर लगती थी, हर बात को मैं सोच-सोच कर बड़ा बना लेती थी, अब हर बात पर एक ही ख्याल आता था — _जो होगा अच्छा होगा, भगवान की कृपा होगी। राधा रानी देख लेंगी।_
सारी दुनिया मोह-माया लगने लगी। सच में। जो चीजें पहले बहुत बड़ी लगती थीं — पैसा, नाम, लोगों की सोच, ये नौकरी, ये लड़ाई-झगड़े, ये समाज का डर — वो सब अचानक से बहुत छोटी लगने लगीं। ऐसा लगने लगा जैसे ये सब तो बस एक नाटक है, एक खेल है जो दो दिन का है। असली चीज तो कुछ और ही है। असली चीज तो वो शांति है जो उस रात वृंदावन में मिली थी, जब खुले आसमान के नीचे बैठे थे।
मन एकदम शांत रहने लगा। इतना शांत कि खुद को भी हैरानी होती थी। जहाँ पहले मन हर समय अशांत रहता था, उलझनों से भरा रहता था, अब हर पल एक अजीब सा सुकून बना रहता था। जैसे अंदर कोई दिया जल गया हो, जो बुझता ही नहीं। चाहे बाहर कितना भी अंधेरा हो, अंदर उजाला ही उजाला।
मैंने देखा, अब मैं लोगों से लड़ती नहीं थी, बहस नहीं करती थी। किसी की चिल्लम-चिल्ली का भी असर नहीं होता था। पहले मैं जवाब देती थी, अब बस मुस्कुरा कर कह देती — राधे-राधे। और सच में, राधा नाम में इतनी शक्ति थी कि सारे गुस्से, सारी टेंशन, सारी चिंता उसी में घुल जाती थी। जैसे सब कुछ राधा नाम के जल में धुल गया हो।
प्रेमानंद जी महाराज की वो बात अब समझ में आने लगी थी — नाम जप करो।_ वो जो हर सत्संग में कहते हैं — राधा नाम जपो, सब ठीक हो जाएगा। वो सच था। सौ प्रतिशत सच था। नाम जप से मन सच में शांत हो जाता था। जब भी मन भटके, बस राधा-राधा जप लो, मन फिर से अपनी जगह पर आ जाता था।
अब हर काम करते हुए मन में एक ही प्रार्थना चलती रहती – हे बिहारी जी, हे राधा रानी, बस अपनी कृपा बनाए रखना। मुझे और कुछ नहीं चाहिए। बस ऐसे ही अपने चरणों से जोड़े रखना। जो होगा, आपकी मर्जी से होगा और अच्छा ही होगा।
वृंदावन ने मुझे दुनिया से दूर नहीं किया, वृंदावन ने मुझे दुनिया में रहते हुए भी दुनिया से ऊपर उठना सिखा दिया। दुनिया में रहो, पर दुनिया को अपने अंदर मत रहने दो — यही तो वृंदावन ने सिखाया।
उसी भाव पर मेरी एक कविता
तन तो लौट आया, मन वहीं रह गया,
वो राधा नाम का नशा, नस-नस में बह गया।
अब कोई चिल्लाए, कोई रूठे, फर्क नहीं पड़ता,
बस लगता है, सब राधा की कृपा से ही तो चलता।
ये दुनिया मोह-माया, ये समझ आ गया,
जब से वृंदावन दिल के अंदर समा गया।
अब हर साँस कहती है, बस राधे-राधे,
इसी नाम में ही तो मेरा सब कुछ है बंधा।