अध्याय – 4

मन डोला, पर हृदय वहीं रहा

एक अधूरी शाम…कभी-कभी जीवन में ऐसा मोड़ आता है जब सब कुछ होते हुए भी मन कहीं नहीं लगता। बाहर से सब सामान्य लगता है, पर भीतर एक अजीब सी उथल-पुथल चलती रहती है।मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही होने लगा।जहाँ मैं सेवा में थी, वहाँ धीरे-धीरे वातावरण बदलने लगा। छोटी-छोटी बातों पर बड़ी-बड़ी चर्चाएँ, मन में अनकही दूरियाँ और काम से ज्यादा भावनाओं का टकराव।

कुछ लोगों को शायद ये बात खटकने लगी थी कि मैं बार-बार वृंदावन की बात करती हूँ, वृंदावन जाती हूँ। मेरे ब्रज-प्रेम को वो मेरी दिनचर्या से अलग करके देखने लगे। उंगलियाँ उठना स्वाभाविक था, पर मैंने कभी किसी का बुरा नहीं माना।क्योंकि जब हृदय में ब्रज बस जाए, तो दुनिया की बातें छोटी लगने लगती हैं।पर मन तो मन है।

कभी-कभी मैं सोचती — चली जाऊँ यहाँ से, सब छोड़ दूँ। और उसी पल आँखें भर आतीं। सोचती कि वृंदावन दूर हो जाएगा? मेरी ब्रजभूमि दूर हो जाएगी? मेरे कान्हा जी, मेरी श्री जी दूर हो जाएँगे?बस इसी सोच ने मुझे रोक कर रखा। बहुत तकलीफों के बावजूद, मैं हर सुबह ये सोचकर रुक जाती कि शायद आज बिहारी जी की कोई कृपा बरस जाए।पर शरीर ने धीरे-धीरे जवाब देना शुरू कर दिया। जो पीड़ा मन में थी, वही तन पर आने लगी।

 

मैं अंदर ही अंदर बीमार पड़ने लगी। ऊपर से निजी जीवन की कुछ उलझनें भी एक साथ आने लगीं, जिन्हें मैं किसी से कह भी नहीं पाती थी।और फिर वो दिन भी आए — जब मैं पूरी तरह तैयार होकर वृंदावन जाने के लिए बैठी, बैग लगा, मन में उत्सव था, पर शरीर ने साथ नहीं दिया। एक बार नहीं, दो-दो बार मेरे वृंदावन के प्लान रद्द हो गए। मैं रोती रही, पर जा नहीं पाई।उस दिन समझ आया — शायद उस दिन राधा रानी की मर्जी नहीं थी। शायद कान्हा जी कुछ और सिखाना चाहते थे।

 

 

वो मेरा आखिरी समय था जब मैंने वृंदावन जाने की तैयारी की थी। उसके बाद परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि मुझे उस स्थान को, उस ब्रजभूमि को छोड़कर निकलना पड़ा।वो मेरे जीवन का सबसे दर्दनाक दिन था।ब्रजभूमि को छोड़ना — ये शब्दों में नहीं बताया जा सकता। भक्ति प्रेम क्या होता है, इसे व्याख्या नहीं किया जा सकता, ये तो सिर्फ महसूस किया जाता है। वो दो दिन का रास्ता, वो विदा, वो आखिरी बार मुड़कर देखना — उसने मुझे भीतर से तोड़ कर रख दिया।

 

मैंने बहुत कोशिश की, बहुत मनाया खुद को कि ना जाऊँ, ना छोडूं। पर जब स्वास्थ्य ही जवाब दे दे, तो मन को भी झुकना पड़ता है।आज भी जब वृंदावन का नाम आता है, तो दिल भर आता है। वो कमी आज भी वैसी की वैसी है। शायद इसीलिए मैं कभी पूरी तरह खुश नहीं हो पाई, क्योंकि मेरा एक हिस्सा आज भी वहीं है — टटिया स्थान की शांति में, निधिवन की पगडंडी में, यमुना के किनारे।पर मैं इसे विरह नहीं, प्रतीक्षा मानती हूँ।कान्हा जी ने गीता में कहा है — जहाँ प्रेम सच्चा होता है, वहाँ दूरी केवल शरीर की होती है, आत्मा की नहीं।तो मैं आज भी उसी प्रतीक्षा में हूँ, कि एक दिन फिर से —दो पथिक, एक ब्रजधाम की ओर लौटेंगे।

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Ankita Singh