अध्याय – 5
एक बीमार छुट्टी का दिन – जब दाऊजी से बरसाना तक दिल ही चल पड़ा
उस दिन मेरा शरीर पूरी तरह से टूट चुका था। तेज बुखार था, आँखें जल रही थीं और ऐसा लग रहा था कि मैं बिस्तर से उठ भी नहीं पाऊँगी। मैंने कार्यालय से छुट्टी ले रखी थी।परंतु सुबह जैसे ही आँख खुली, मन में एक ही जिद ने जन्म ले लिया – आज बरसाना जाना है। राधा रानी से मिलना है।हम सबसे पहले दाऊजी के धाम गए।
वहाँ की शांति ने जैसे मेरे बुखार को आधा कर दिया। फिर हम सीधे कीर्ति मंदिर, बरसाना गए। कीर्ति मंदिर को देखते ही मेरी आँखें खुली की खुली रह गईं। इतना विशाल, इतना सुंदर, जैसे राधा रानी का महल सच में धरती पर उतर आया हो।वहाँ से हम गोकुल और रमण रेती गए। रमण रेती की रेत को हाथ में लिया तो लगा जैसे मक्खन हो।
शाम तक जब लौटे, तो मैं पूरी तरह से स्वस्थ थी। तब समझ आया – यह बीमारी शरीर की नहीं, वृंदावन से दूरी की थी।और उसी यात्रा के अंतिम पड़ाव में हमने जो किया, वह मेरे जीवन की सबसे बड़ी सीख बन गया – गोवर्धन गिरिराज जी की परिक्रमा।हम शाम को गोवर्धन पहुँचे। गोवर्धन पहुँचते ही मन में एक अलग ही जोश आ गया। हमने तय किया – आज पच्चीस कोस की परिक्रमा करनी है।रात का समय था। हाथ में कोई टॉर्च नहीं, बस हृदय में राधा नाम का दीपक।
हमने परिक्रमा शुरू की।शुरू के एक-दो कोस तो बहुत आसान लगे। पर जैसे-जैसे आगे बढ़े, पैरों में छाले पड़ने लगे। मैं तो एक कोस में ही हार मानने लगी थी। मन कह रहा था – बस, अब नहीं चला जाता। पर तभी साथ चल रहे बृजवासी बोले – बिटिया, राधे-राधे बोलती जाओ, गिरिराज जी खुद ताकत देंगे।हम राधे-राधे बोलते हुए चलते रहे।
पग-पग पर छाले थे, पर मन मतवाला था। रात भर हम चलते रहे। कभी कच्ची पगडंडी, कभी पक्की सड़क, कभी घना अंधेरा। पर हर मोड़ पर लगता था जैसे कान्हा जी खुद साथ चल रहे हैं।बीच में मानसी गंगा पर हमने थोड़ा जल पिया, थोड़ा विश्राम किया। फिर से चल पड़े। जो लोग एक कोस में हारे थे, उन्होंने गिरिराज जी की कृपा से पूरी पच्चीस कोस की परिक्रमा पूरी कर ली।सुबह जब परिक्रमा पूरी हुई, तो पैरों में दर्द नहीं, आँखों में आँसू थे। ऐसा लगा जैसे हमने कोई पहाड़ नहीं, अपने मन के सारे पापों की परिक्रमा कर ली हो।
गिरिराज जी ने हमें अपना लिया था।उस दिन मैंने सीखा – जब राधा रानी बुलाती हैं, तो टूटा हुआ शरीर भी दौड़ पड़ता है, और जब गिरिराज जी कृपा करते हैं, तो पच्चीस कोस भी एक कोस जैसा लगता है।भक्त को केवल एक कदम बढ़ाना होता है, बाकी निन्यानवे कदम लाडली जी और गिरिराज जी खुद चलकर आते हैं।
॥ राधे-राधे, गिरिराज धरण की जय ॥