अध्याय – 6

वो सिलसिला जो रुकना नहीं चाहता था

 

उसके बाद तो जैसे एक सिलसिला ही बन गया था।वृंदावन जाना अब कोई प्लान नहीं होता था, अब तो मन अपने आप ही कह देता था — चलो, वृंदावन चलते हैं। और हम चल देते थे। हर बार वही रात भर की यात्रा, वही रात के बारह-एक बजे वृंदावन पहुँचना, वही लाइन, वही इंतजार।

पर हर बार एहसास नया लगता था।अब की बार हम अकेले नहीं थे। हमने सोचा, ये आनंद सिर्फ हम ही क्यों लें? ये सुख, ये शांति सबको मिलनी चाहिए। तो हम अपने साथ अपने एक-दो सहकर्मियों को भी ले गए।जैसे ही हम वृंदावन के गेट पर पहुँचे, वही पुराना एहसास फिर से लौट आया। गेट देखते ही शरीर में एक अजीब सी लहर दौड़ गई।

एक अलग सी ही ऊर्जा, एक अलग सी ही शक्ति। ऐसा लगने लगा जैसे हम अकेले नहीं चल रहे, हमारे साथ कान्हा जी चल रहे हैं, राधा रानी खुद हमें अपने धाम में बुला रही हैं, हमारा हाथ पकड़ कर अंदर ले जा रही हैं। वो हवा भी अलग लगती थी, वो जमीन भी अलग लगती थी।हमने फिर से वही किया — प्लास्टिक बिछा कर रात भर लाइन में बैठना।

 सुबह-सुबह महाराज जी के दर्शन की बारी।और फिर वो पल आया।महाराज जी आए, और जैसे ही हमारे सहकर्मी ने उन्हें पहली बार देखा, मैं उनकी आँखें देखती रह गई। उनकी भी आँखें भर आईं। वो जो अब तक सामान्य से खड़े थे, अचानक पागलों की तरह राधे-राधे चिल्लाने लगे।

उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।उस पल मुझे एक बहुत बड़ी बात समझ आई।ये भाव सिर्फ मेरा नहीं है। ये जो खिंचाव है, ये जो आँखों में नमी है, ये जो दिल में तड़प है — ये सिर्फ मुझे ही नहीं होती, ये सबको होती है।

 जो भी एक बार सच्चे मन से महाराज जी को देख लेता है, जो भी एक बार वृंदावन की उस भीड़ में राधा नाम सुन लेता है, वो ऐसे ही पागल हो जाता है।ये कोई दिखावा नहीं था, ये आत्मा का मिलना था।फिर हमने दर्शन किए। आँखों में भी बसा लिया, कैमरे में भी बसा लिया। पर मन कह रहा था — कैमरे में तो सिर्फ फोटो आएगी, असली तस्वीर तो आँखों में और दिल में बस गई है, जो कभी मिटेगी नहीं।और हम वापस लौट आए। फिर से वही, तन तो लौट आया, पर मन वहीं वृंदावन में ही छूट गया।

 

उसी भाव पर मेरी एक कविता –

 

फिर चला वो सिलसिला, फिर वृंदावन जाना हुआ,

गेट देखते ही लगा, कान्हा साथ आना हुआ।

साथ जो थे, वो भी रोए, राधा नाम सुन कर,

समझा तब मैंने, ये प्रेम है सबके मन भर।

आँखों में बसाया, कैमरे में भी उतारा,

पर दिल में जो बसा, वो सबसे प्यारा।

 

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Ankita Singh