अध्याय -7
( नाम ही बचा है, नाम ही सहारा है )
अपने घर तो मैं आ गई, पर सच कहूँ तो घर आई ही नहीं।शरीर यहाँ है, इस कमरे में, इन दीवारों के बीच। पर मेरे प्राण तो उसी धूल में अटके हुए हैं, जहाँ कभी मेरे चरण पड़े थे। वृंदावन से निकलते समय बस एक मोड़ था, मैंने पीछे मुड़कर देखा, और वहीं मेरा सब कुछ छूट गया।तब से मेरी आँखें सूखी ही नहीं। हर पल भीगी-भीगी सी रहती हैं। कारण कोई नहीं पूछता, क्योंकि कारण बताया नहीं जाता, केवल जिया जाता है।
जब कभी मंदिर की घंटी कहीं दूर बजती है, जब कभी मोर की ध्वनि सुनाई देती है, जब कभी तुलसी की गंध आती है, तो भीतर से कुछ टूट सा जाता है।मैं बिलख पड़ती हूँ।कभी-कभी लगता है, मैंने ऐसा कौन सा पाप किया कि मेरी लाडली जी ने मुझे अपनी गोद से दूर कर दिया। मैंने तो कभी किसी का बुरा नहीं चाहा। फिर यह दूरी क्यों? यह तड़प क्यों? यह छटपटाहट क्यों?बहुत रोई हूँ। इतना रोई हूँ कि अब आँसू भी थक गए हैं।दो बार मैंने थैला लगाया, पूरी तैयारी की, टिकट देखा, मन में उत्सव मनाया कि कल वृंदावन होऊँगी, कल यमुना जी के किनारे बैठूँगी, कल बाँके बिहारी जी के दर्शन करूँगी। और दोनों बार, ऐन समय पर, कुछ ऐसा हुआ कि जाना रुक गया। शरीर ने साथ नहीं दिया। मार्ग बंद हो गया।मैं समझ गई। यह मेरा रोकना नहीं था, यह उनकी रोक थी। शायद वे मुझे कुछ और सिखाना चाहते थे।पहले मैं नाम जप को समझती ही नहीं थी।सच कहूँ तो मुझे लगता था, यह तो बूढ़े लोगों का काम है, या जिनके पास समय बहुत है उनका काम है।
माला पकड़ना, बैठकर जप करना, मुझे बोझ लगता था। मन लगता ही नहीं था। दो मिनट बैठती, फिर मन कहीं और चला जाता।पर जब वृंदावन छूटा, जब हृदय टूटा, जब कोई सहारा नहीं बचा, जब कोई सुनने वाला नहीं बचा, तब एक दिन अनायास ही मेरे मुख से निकला – राधा।केवल एक शब्द। राधा।और पता नहीं उस एक शब्द में ऐसा क्या था कि मेरी रुकती हुई साँस चल पड़ी।उस दिन से मैंने पकड़ लिया।
अब मैं पगली की तरह जप करती हूँ। चलते-फिरते, उठते-बैठते, बर्तन माँजते, रसोई में, आँगन में, रात में जब नींद नहीं आती, तब भी। मेरे हाथ में माला हो न हो, पर जीभ पर नाम सदा रहता है।राधा राधा राधा राधा। श्री राधे श्री राधे।गिनती नहीं करती। गिनने से क्या होगा। मैं तो बस जपती हूँ। जितना हो सके उतना। कभी सौ बार, कभी हज़ार बार, कभी अनगिनत बार।
थक जाती हूँ तो भी जपती हूँ, रोती हूँ तो भी जपती हूँ।क्योंकि अब समझ आया, नाम ही तो वह डोर है जो वहाँ तक जाती है। शरीर वहाँ नहीं जा सकता, पर नाम तो हर क्षण वहाँ पहुँच जाता है।मैं जब राधा नाम लेती हूँ, तो लगता है जैसे लाडली जी ने मेरी ओर देख लिया। जब श्री राधे कहती हूँ, तो लगता है जैसे उन्होंने मेरा आँचल थाम लिया। एक पल को लगता है, मैं वहीं हूँ, उसी बरसाने की गली में, उसी निधिवन की छाया में।हे मेरी लाडली जी, हे मेरे कान्हा। यदि मुझसे कोई भूल हुई हो, तो क्षमा कर दो। मैं अबला हूँ, नादान हूँ, मूर्ख हूँ। मुझे और कुछ नहीं आता, केवल रोना आता है और आपका नाम लेना आता है।यदि इस नाम में सत्य है, यदि इस नाम में करुणा है, तो मुझे फिर से बुला लो। जैसे धूल को आँधी उठा ले जाती है, वैसे ही मुझे उठा कर अपनी ब्रजभूमि में ले चलो। मुझे नहीं चाहिए बड़ा घर, नहीं चाहिए बड़ा मान, नहीं चाहिए संसार का सुख। मुझे तो बस वही धूल चाहिए, वही कण चाहिए, जहाँ आपके चरण पड़े थे।
जो भी इस पंक्ति को पढ़ रहा है, उससे मैं हाथ जोड़ कर कहती हूँ।यदि आपका भी मन कभी उजड़ जाए, यदि आपका भी घर कभी पराया लगने लगे, यदि आपकी भी आँखें बिना कारण भीगने लगें, तो समझ लेना, श्री जी आपको पुकार रही हैं। तब आप भी सब छोड़ कर केवल नाम पकड़ लेना।यह नाम कभी धोखा नहीं देता।
यह नाम कभी अकेला नहीं छोड़ता। लोग छोड़ देते हैं, स्थान छूट जाते हैं, पर यह नाम सदा साथ रहता है।मैंने जप कर के देखा है। पहले मेरा मन भटकता था, अब टिकने लगा है। पहले मैं संसार से डरती थी, अब मुझे केवल एक ही डर लगता है कि कहीं यह नाम छूट न जाए।इसलिए हे पढ़ने वाले, यदि मेरे आँसुओं में कोई सच्चाई है, तो आज से तुम भी एक माला पकड़ लो। अधिक नहीं, केवल दिन में एक बार, सच्चे मन से कह दो – राधा। फिर देखना, तुम्हारी भी आँखें कैसे भीगती हैं, तुम्हारा भी हृदय कैसे वृंदावन बन जाता है।मेरी तो बस एक ही प्रार्थना है, एक ही जिद है, एक ही प्यास है।हे राधा रानी, हे करुणा की मूर्ति, इस पगली को, इस टूटी हुई को, इस रोती हुई को, अपनी शरण में ले लो। अब और दूरी सही नहीं जाती। अब और विरह सहा नहीं जाता।मुझे बुला लो। मुझे अपना बना लो। मुझे अपनी ब्रजभूमि की धूल में मिला लो।ताकि जब मेरे प्राण निकलें, तो वे यमुना के किनारे निकलें। ताकि जब मेरी आँखें बंद हों, तो सामने मेरे बाँके बिहारी हों और मेरी लाडली जी हों।राधा राधा राधा राधा
श्री राधे श्री राधे श्री राधे