अध्याय – 8

घर लौट आई, पर मन वृंदावन में ही रह गया

 

अपने घर तो मैं आ गई।पर यह घर ब्रजभूमि से हज़ारों कोस दूर है। शरीर यहाँ है, पर मन अब भी वहीं है।आने के बाद से मेरी आँखें सदा नम सी रहती हैं। उन आँखों में मेरे कान्हा और राधा रानी की छवि वैसी की वैसी छपी हुई है, जैसे वृंदावन में अपनी इन आँखों से उन्हें निहारती थी। वही यमुना का किनारा, वही मंदिरों की घंटियाँ, वही गलियों की धूल।जब-जब उनकी स्मृति आती है, मैं बिलख-बिलख कर रो पड़ती हूँ। हृदय फटने लगता है। मन में एक ही प्रश्न उठता है — मेरे ऐसे कौन से बुरे कर्म थे कि आज मैं उनसे इतनी दूर हो गई?बहुत प्रयत्न किए, बहुत प्रयास किए, पर मैं वृंदावन नहीं जा पाई।मेरे लिए वृंदावन से दूर होना, शरीर से प्राण निकल जाने जैसा है। लोग कहते हैं — समय सब ठीक कर देता है। पर मेरा समय तो वहीं ठहर गया है। मेरी दशा ऐसी हो गई है कि मानो सब कुछ छूट जाए, स्वीकार है, पर वृंदावन कभी न छूटे।मैं नहीं जानती, मेरे कान्हा और राधा रानी ने मेरे किस कर्म का दंड दिया, या यह किसी परीक्षा का कारण बनाया। जो भी हो, इस दूरी ने मुझे भीतर से तोड़ कर रख दिया है।आज भी यदि कोई नौकरी मिले, कोई अवसर मिले, तो मैं सबसे पहले यही सोचती हूँ — क्या वहाँ से वृंदावन पास होगा? मैंने वृंदावन के लिए न जाने कितनी यात्राएँ रद्द कर दीं, कितने अच्छे-अच्छे अवसर, कितनी रिक्तियाँ जाने दीं — केवल एक वृंदावन की चाह में।और यह मोह, यह प्रेम मेरा कभी नहीं छूटेगा। कभी नहीं छूटेगा।कहते हैं, यदि मनुष्य भगवान को पा ले, तो फिर संसार में मन नहीं लगता। मैं जानती हूँ, भगवान तो हर जगह हैं, कण-कण में हैं। पर वृंदावन की बात ही निराली है।जो कभी वृंदावन नहीं गया, उसे मैं क्या बताऊँ कि वृंदावन क्या है? वहाँ के कण-कण के लिए मेरी आँखें कितनी रोई हैं, वहाँ के एक-एक क्षण के लिए मेरा हृदय कितना तड़पा है — यह शब्दों में नहीं कहा जा सकता।अंत में, मैं बस राधा रानी से यही प्रार्थना करती हूँ —हे लाडली जी, शीघ्र ही मुझे अपनी ब्रजभूमि में बुला लीजिए। आपके बिना यह जीवन, जीवन नहीं लगता।कविता – बुला लो लाडली जीवृंदावन से दूर हुई, तो जाना क्या होता है विरह,

शरीर तो घर आ गया, पर प्राण वहीं रह गए।आँखें नम रहती हैं, हर पल छवि तुम्हारी आती है,

कान्हा की बंसी, राधा की हँसी, हृदय में बजती जाती है।हज़ारों कोस का अंतर, पर मन को दूरी नहीं भाती,

हर धड़कन में, हर साँस में, ब्रज की रज ही आती है।क्या बुरे कर्म थे मेरे, जो मुझको दूर किया,

मैंने तो हर जन्म माँगा, बस तेरा ही दर दिया।बहुत रोई, बहुत तड़पी, पर द्वार न खुला,

दो बार सजी, दो बार चली, पर मार्ग ही रुक गया।नौकरी छोड़ी, नगर छोड़े, सब अवसर जाने दिए,

एक वृंदावन के लिए, सब बंधन तोड़ दिए।लोग कहते हैं भगवान हर जगह होते हैं,

पर मैं क्या करूँ, मेरा मन तो वृंदावन में ही रोता है।वहाँ की गलियों में मेरा बचपन छूट गया,

वहाँ की धूल में मेरा आँचल लिपट गया।हे राधा रानी, सुन लो, यह दासी पुकारती है,

तेरी ब्रजभूमि के बिना, हर साँस बिखरती है।जल्दी बुला लो, लाडली, अब और सहा न जाए,

तुम्हारे बिना, कान्हा के बिना, एक पल रहा न जाए।

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Ankita Singh