अध्याय-9

 ( वृंदावन की वह पहली परिक्रमा )

उस परिक्रमा के बाद एक सप्ताह बीत गया। गोवर्धन की पच्चीस कोस की वह पैदल यात्रा, पैरों के छाले, और हृदय में जो आनंद था — वह सब अभी भी मन में वैसे का वैसा बसा हुआ था। शरीर कार्यालय में था, पर मन अब भी ब्रज की रज में ही अटका हुआ था।फिर एक दिन फिर से वही समाचार मिला — वही तीर्थ-यात्रा की गाड़ी फिर से जाने वाली है। इस बार गंतव्य कोई और नहीं, स्वयं वृंदावन।सुनते ही मन में फिर वही पुरानी बेचैनी जाग उठी। गोवर्धन तो हो गया था, पर वृंदावन की परिक्रमा तो अभी शेष थी। और मन ने कहा — जाना तो है ही।हमने फिर से अपना नाम लिखवा दिया।गाड़ी ने दिन में प्रस्थान किया। रास्ता लंबा था, पर इस बार थकान नहीं थी। इस बार केवल उत्साह था। मन में एक ही नाम था — राधे-राधे। गाड़ी में बैठे-बैठे हम बस यही सोच रहे थे कि कब वृंदावन की सीमा आएगी और कब वह पावन भूमि दिखेगी।रात के बारह-एक बजे हम वृंदावन पहुँचे।रात का वृंदावन कुछ और ही होता है। दिन में जहाँ भीड़ और चहल-पहल रहती है, रात में वहाँ एक अद्भुत शांति होती है। मंदिरों के शिखर चाँद की रोशनी में चमक रहे थे, और यमुना के किनारे से आती हुई ठंडी हवा मन को शीतल कर रही थी। गलियों में अभी भी कहीं-कहीं से मृदंग और कीर्तन की ध्वनि सुनाई दे रही थी।गाड़ी से उतरते ही हमने निश्चय किया — अभी विश्राम नहीं, अभी परिक्रमा करेंगे।यह मेरे जीवन की वृंदावन की पहली परिक्रमा थी।हमने परिक्रमा आरंभ की। रात के अंधेरे में, हाथ में कोई बड़ा दीपक नहीं, बस हृदय में नाम का दीपक। सड़कें सुनसान, पर मन में भय नहीं, केवल आनंद। हमारे साथ और भी यात्री थे, कोई धीरे-धीरे राधा नाम जप रहा था, कोई बांके बिहारी का जयकारा लगा रहा था।रात भर हम चलते रहे।कभी यमुना जी के किनारे से होकर, कभी छोटी-छोटी कुंज गलियों से होकर। वृंदावन की परिक्रमा केवल पैरों से नहीं होती, वह तो मन से होती है। हर कदम पर लगता जैसे लता-पता, कण-कण कह रहा हो — राधे-राधे। ठंडी हवा में तुलसी की महक थी, और कहीं-कहीं गायों के गले की घंटियों की ध्वनि।चलते-चलते भोर हो गई।भोर का वृंदावन तो स्वर्ग से भी सुंदर लगता है। जैसे ही उजाला हुआ, हमने दर्शन आरंभ किए। बिहारी जी के मंदिर में सुबह की आरती, राधा वल्लभ जी के दर्शन, निधिवन की वह अलौकिक शांति जहाँ आज भी राधा-कृष्ण के लीला की अनुभूति होती है — सब दर्शन किए।थकान कहीं थी ही नहीं। पूरी रात जागकर परिक्रमा करने के बाद भी शरीर में एक नई ऊर्जा थी। वह ऊर्जा हमारी नहीं, वृंदावन की कृपा थी।दोपहर होने तक हमने सभी प्रमुख दर्शन कर लिए थे। मन तृप्त हो चुका था, पर जाने का मन नहीं था। पर गाड़ी का समय हो चला था।फिर हम वहाँ से निकल पड़े।गाड़ी में बैठे हुए भी मन पीछे ही छूट गया था — उन्हीं गलियों में, यमुना के किनारे, और उस रात की परिक्रमा में।तब समझ आया — वृंदावन एक बार में पूरा नहीं होता। वह हर बार नया लगता है। और उसकी परिक्रमा तो कभी समाप्त होती ही नहीं, वह तो जीवन भर चलती रहती है

 

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Ankita Singh