आभार
“राधा नामहि परम सुख, कृष्ण नामहि परम गति।”
सबसे पहले उन दोनों के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम, जिनके बिना एक शब्द भी लिखना संभव नहीं था – मेरी स्वामिनी श्री राधा रानी और मेरे सर्वस्व श्री श्यामसुंदर। ये पुस्तक मेरी नहीं, आपकी ही कृपा का फल है। आपने ही लिखवाई है, मैंने तो केवल अपनी टूटी-फूटी कलम चलाई है।
मेरे पूज्य गुरुदेव के श्री चरणों में सादर वंदन, जिनके आशीर्वाद और मार्गदर्शन के बिना मैं इस पथ पर चल ही नहीं पाती। आपके दिखाए हुए भक्ति मार्ग ने ही मुझे ब्रज का अर्थ समझाया।
मेरे माता-पिता को हृदय से धन्यवाद, जिन्होंने मुझे हमेशा मेरे सपनों को पूरा करने की स्वतंत्रता दी। आप दोनों ने मुझे सिखाया कि जीवन में सबसे बड़ा धन प्रेम और संस्कार है। आपके बिना मैं कुछ भी नहीं हूँ।
अब वो आभार, जिसके लिए शब्द कम पड़ जाते हैं –
श्रीमती प्रियंका सिंह जी को विशेष हृदय से आभार। दीदी, आपने इस पुस्तक को सिर्फ प्रेरित ही नहीं किया, आपने इसे जिया है। जब मैं लिखते-लिखते थक जाती थी, जब लगता था कि ये पुस्तक पूरी नहीं हो पाएगी, तब आपने ही मेरा हाथ थामा। आपके एक-एक शब्द, आपके सुझाव और आपका विश्वास ही है जिसने “दो पथिक, एक ब्रजधाम” को एक कल्पना से एक पुस्तक बना दिया। आप मेरी बड़ी बहन जैसी हैं, मेरी मार्गदर्शिका हैं। ये पुस्तक जितनी मेरी है, उतनी ही आपकी भी है
मेरी छोटी बहन को दिल से धन्यवाद – तूने हर समय मेरी छोटी-छोटी बातों को समझा, मेरे मूड को संभाला और बिना कहे मेरा साथ दिया। तेरा प्यार ही मेरी ताकत है।
मेरे हर कदम पर, हर चीज़ में हमेशा साथ देने वाले श्री विष्णु चाहर जी को विशेष आभार।
मेरे सभी मित्रों और शुभचिंतकों का, जिन्होंने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मेरी सहायता की, मेरे लिखे हुए हर पन्ने को पढ़ा और मुझे बेहतर करने के लिए प्रोत्साहित किया।
मेरे प्रकाशक और संपादक मंडल का हार्दिक आभार, जिन्होंने इस पांडुलिपि पर विश्वास किया और इसे इतने सुंदर रूप में आप सभी के सामने प्रस्तुत किया। और अंत में, आप सभी पाठकों का।
ये पुस्तक आपके हाथों में है, यही मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है। यदि इसे पढ़ते हुए आपके मुख से एक बार भी “राधे-राधे” निकल जाए, तो मैं समझूंगी कि मेरा लिखना सफल हो गया।
ये पुस्तक ब्रज की उस पावन धूल को समर्पित है, जहाँ दो पथिक मिलकर एक हो जाते हैं।
सादर,
अंकिता सिंह