इस पुस्तक के बारे में

 – दो पथिक, एक ब्रजधाम यह पुस्तक केवल एक यात्रा-वृत्तांत नहीं है। यह दो मनुष्यों की नहीं, दो आत्माओं की यात्रा की कथा है।

 

 और वह यात्रा किसी पर्वत या नगर की नहीं, उस धाम की है जहाँ आज भी प्रेम जीवित है — ब्रजधाम की।

 

बहुत से लोग वृंदावन जाते हैं। मंदिर देखते हैं, दर्शन करते हैं, प्रसाद लेते हैं और लौट आते हैं। पर कुछ लोग वृंदावन जीते हैं। हर गली में, हर रज के कण में, हर जयकारे में वे अपने ठाकुर को खोजते हैं। यह पुस्तक उन्हीं में से एक हृदय की कथा है।

इस पुस्तक में आप क्या पढ़ेंगे?इस पुस्तक में दस अध्याय हैं और हर अध्याय एक अलग यात्रा, एक अलग अनुभूति है।आप पढ़ेंगे कि कैसे एक साधारण छुट्टी के दिन, अस्वस्थ शरीर के साथ भी मन राधा रानी के बरसाना जाने को आतुर हो उठता है। कैसे दाऊ जी के धाम से आरंभ होकर कीर्ति मंदिर, गोकुल, रमण रेती और गोवर्धन तक की यात्रा केवल आँखों से नहीं, हृदय से की जाती है।आप पढ़ेंगे पच्चीस कोस की वह पहली गोवर्धन परिक्रमा, जहाँ एक कोस चलते ही पैरों में छाले पड़ गए थे, पर नाम जपते-जपते पूरी परिक्रमा कब पूरी हो गई, पता ही नहीं चला। यह शरीर के बल से नहीं, कृपा के बल से हुई यात्रा थी।आप पढ़ेंगे वृंदावन की वह रात वाली परिक्रमा, जब रात के बारह बजे पूरा धाम सो रहा था और दो पथिक हाथ में नाम का दीपक लेकर यमुना के किनारे-किनारे चल रहे थे। भोर होने पर बिहारी जी की आरती और निधिवन की वह नीरवता, जहाँ आज भी लीला होती है।आप पढ़ेंगे टटिया स्थान की कथा — वह स्थान जहाँ के बारे में कहा जाता है कि वहाँ आज तक कलियुग प्रवेश नहीं कर पाया। जहाँ बिजली नहीं, केवल दीपक हैं, जहाँ चलदूरभाष यंत्र वर्जित हैं और समय जैसे थम गया है।और आप पढ़ेंगे बेलवन की वह रात। केलीकुंज के पीछे स्थित वह सघन, सुनसान वन जहाँ महाराज जी के दर्शन की आशा में हम गए, पर दर्शन नहीं हुए। गाड़ी खराब हो गई, अंधेरा था, जंगल था और हृदय टूटा हुआ था। यह अध्याय सिखाता है कि वृंदावन हर बार दर्शन नहीं देता, वह कभी-कभी प्रतीक्षा भी करवाता है। और वही प्रतीक्षा प्रेम की सबसे बड़ी परीक्षा है।दो पथिक कौन हैं?इस पुस्तक का नाम है — दो पथिक, एक ब्रजधाम। तो मन में प्रश्न उठता है कि ये दो पथिक कौन हैं?कभी-कभी ये दो पथिक मैं और मेरे सहकर्मी हैं, जो एक साथ यात्रा करते हैं। कभी-कभी ये दो पथिक मैं और मेरा मन हैं — एक थका हुआ शरीर और एक उतावला मन। और कभी-कभी ये दो पथिक हम और आप हैं — एक जो लिख रहा है और एक जो पढ़ रहा है, पर धाम दोनों का एक ही है — ब्रजधाम।इस पुस्तक का हर पृष्ठ यही कहता है कि ब्रज तक पहुँचने के लिए धन नहीं, सुविधा नहीं, केवल बुलावा चाहिए। और जब राधा रानी बुलाती हैं, तो बीमार शरीर भी चल पड़ता है, टूटी गाड़ी भी धक्का देकर वृंदावन पहुँच ही जाती है।लेखिका क्या कहना चाहती है?मैं, अंकिता सिंह, कोई लेखिका नहीं हूँ। मैं तो केवल एक पथिक हूँ। मैंने यह पुस्तक इसलिए नहीं लिखी कि मैं बहुत जानती हूँ। मैंने इसलिए लिखी क्योंकि जो मैंने महसूस किया, वह मैं बाँटना चाहती थी।मैं यह बताना चाहती हूँ कि भक्ति के लिए बड़े-बड़े नियम नहीं चाहिए। बस एक सच्चा मन चाहिए। यदि आप भीड़ से थक गए हैं, जीवन की भाग-दौड़ से थक गए हैं, तो एक बार वृंदावन की किसी गली में बैठ कर केवल राधे-राधे कह कर देखिए। आपको उत्तर मिल जाएगा।यह पुस्तक उन सभी के लिए है जो वृंदावन जा चुके हैं और फिर जाना चाहते हैं। और उन सभी के लिए भी है जो आज तक कभी नहीं गए, पर मन में एक बार जाने की इच्छा रखते हैं।मेरा विश्वास है कि इस पुस्तक को पढ़ते-पढ़ते आप वृंदावन की परिक्रमा कर लेंगे, बिना टिकट के, बिना गाड़ी के, केवल शब्दों के सहारे।अंत में केवल एक ही प्रार्थना है —यदि इस पुस्तक का कोई एक पृष्ठ भी आपको वृंदावन की ओर एक कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित कर दे, तो मेरा लिखना सफल हो जाएगा।राधे-राधे।

— अंकिता सिंह

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Ankita Singh