उपसंहार
– अंत नहीं, एक नई प्रतीक्षाकहते हैं हर यात्रा का एक अंत होता है। पर मेरी ये यात्रा तो ऐसी है जिसका कोई अंत ही नहीं है।किताब यहाँ खत्म हो रही है, पर मेरी कहानी नहीं। मेरी कहानी तो उस दिन खत्म होगी जिस दिन मैं फिर से वृंदावन की उस धूल में लोटूँगी, जिस दिन फिर से यमुना जी के किनारे बैठूँगी, जिस दिन फिर से बाँके बिहारी जी की उस भीड़ में धक्का खाते हुए भी मुस्कुराऊँगी।आज जब मैं पीछे मुड़ कर देखती हूँ तो लगता है मैंने क्या-क्या नहीं खोया। एक शहर छोड़ा, एक नौकरी छोड़ी, कितने अच्छे अवसर छोड़े, कितने लोगों का साथ छोड़ा। लोग कहते हैं – पगली है। वृंदावन के लिए इतना सब कौन छोड़ता है?पर मैं क्या बताऊँ कि मैंने खोया नहीं, पाया है। जो पाया है वो इस संसार में कहीं नहीं मिलता।मैंने पाया है – रात भर खुले आसमान के नीचे पन्नी पर बैठ कर राधा नाम जपने का सुख।
मैंने पाया है – लाखों की भीड़ में एक साथ रोने का सुख।
मैंने पाया है – पच्चीस कोस की गोवर्धन परिक्रमा में पैरों में छाले लेकर भी राधे-राधे कहते हुए चलने का सुख।
मैंने पाया है – बेलवन की उस अधूरी रात को पूरा होते हुए देखना।
मैंने पाया है – निधिवन की उस पगडंडी में जहाँ आज भी रास होता है, वहाँ खड़े होकर काँपना।
मैंने पाया है – टटिया स्थान की शांति जहाँ संतों की चरण-रज आज भी भव से पार कर देती है।ये सब मैंने खोया नहीं, जिया है।बहुत लोग पूछते हैं – वृंदावन में ऐसा क्या है? मैं उनसे बस एक ही बात कहती हूँ – एक बार जाकर तो देखो। एक बार उस धूल को अपने माथे पर लगा कर तो देखो। फिर तुम खुद ही नहीं लौटना चाहोगे। फिर तुम्हारा भी मन वहीं रह जाएगा, जैसे मेरा रह गया है।आज मैं घर पर हूँ। शरीर से घर पर हूँ। पर मेरे प्राण? मेरे प्राण तो आज भी उसी कुंज में भटक रहे हैं। आज भी मेरी आँखें जब बंद होती हैं तो मुझे वही दृश्य दिखता है – प्रेमानंद जी महाराज आ रहे हैं, सब रो रहे हैं, और मैं हाथ में फोन लिए काँप रही हूँ।पहले मुझे लगता था नाम जप तो बूढ़ों का काम है। माला पकड़ना बोझ है। दो मिनट में मन भटक जाता था। आज? आज बिना नाम के एक पल भी नहीं कटता। उठते-बैठते, चलते-फिरते, बर्तन माँजते, झाड़ू लगाते, रात को जब नींद नहीं आती तब भी – राधा, राधा, श्री राधे। यही मेरी साँस बन गई है।क्योंकि समझ आ गया – शरीर वहाँ नहीं जा सकता, पर नाम तो हर क्षण वहाँ पहुँच जाता है। ये नाम ही वो डोर है जो मुझे वहाँ से जोड़े हुए है। लोग छोड़ देते हैं, शहर छूट जाते हैं, नौकरी छूट जाती है, पर ये नाम कभी साथ नहीं छोड़ता।मैं जानती हूँ मेरी लाडली जी मुझे फिर बुलाएँगी। जरूर बुलाएँगी। क्योंकि जो एक बार अपना बना लेता है, उसे वो कभी पराया नहीं करता। बिहारी जी बड़े दयालु हैं। वो परीक्षा लेते हैं, पर छोड़ते कभी नहीं।इसलिए मैं आज भी प्रतीक्षा में हूँ। रोज़ तुलसी में जल डालते हुए, रोज़ शाम को दिया जलाते हुए, रोज़ माला घुमाते हुए मैं बस एक ही प्रार्थना करती हूँ -हे लाडली जी, मुझे फिर से बुला लो।मुझे नहीं चाहिए बड़ा घर, नहीं चाहिए बड़ी गाड़ी, नहीं चाहिए संसार का कोई सुख। मुझे तो बस वही ब्रज की धूल चाहिए, वही यमुना का किनारा चाहिए, वही बाँके बिहारी जी की एक झलक चाहिए।और अंत में, जो भी इस किताब को पढ़ रहा है, उससे मैं हाथ जोड़ कर एक ही बात कहना चाहती हूँ -यदि तुम्हारा भी मन कभी उजड़ जाए, यदि तुम्हें भी लगे कि सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं है, यदि तुम्हारी भी आँखें बिना कारण भीगने लगें, तो समझ लेना – श्री जी तुम्हें पुकार रही हैं।तब तुम भी सब छोड़ कर एक बार वृंदावन चले जाना। एक बार राधा नाम लेकर तो देखना। फिर देखना, तुम्हारा भी जीवन कैसे बदलता है। कैसे तुम्हारा भी घर वृंदावन बन जाता है।क्योंकि ये कहानी सिर्फ मेरी नहीं है।
ये कहानी हर उस दिल की है जो वृंदावन से दूर होकर भी वृंदावन में ही रहता है।दो पथिक चले थे, एक धाम की ओर…
राहें भले ही अलग हों, मंज़िल तो वही है, जहाँ हर कदम पर श्याम हैं।अब मैं अपनी लेखनी को विराम देती हूँ, पर मेरे हृदय में राधा नाम का जप कभी विराम नहीं लेगा।अंतिम महाकविता – फिर लौटेंगेहम दो पथिक चले थे, लेकर राधा नाम,
धूल भरे पाँव थे, पर ऊँचा था प्रणाम।
बाँके की गली में, दिल को सुकून मिला,
यमुना के किनारे, हर गम वहीं बहा।निधिवन में देखा, प्रेम का वो रास,
जहाँ पत्ते भी करते, राधे का ही जाप।
टटिया की शांति में, मन को घर मिला,
बेलवन की रात में, श्याम स्वयं मिला।गोवर्धन की राह पर, छाले भी फूल बने,
राधे-राधे बोलते ही, सारे शूल फूल बने।
पच्चीस कोस चले, पर थकान नहीं आई,
क्योंकि साथ-साथ मेरे, मेरी लाडली आई।फिर वक्त ने छीना, मेरा वो धाम,
शरीर ले आया घर, छूट गया वो गाँव।
आँखें तब से नम हैं, दिल तब से उदास,
जैसे प्राण बिना तन, जैसे बिना श्याम के रास।दो बार सजी, दो बार चली, फिर लौट के आई,
राधा रानी की मर्जी, मैं समझ नहीं पाई।
नौकरी भी छोड़ी, शहर भी छोड़े सारे,
एक वृंदावन के लिए, तोड़े बंधन सारे।पहले सोचा था, जप तो बेकार है,
माला पकड़ना तो, वक्त की हार है।
पर जब टूटी मैं, जग ने जब ठुकराया,
तब एक शब्द ने ही, मुझको है बचाया।राधा! बस एक शब्द, और साँस चल पड़ी,
डूबती हुई नैया, किनारे लग पड़ी।
अब जपती हूँ पगली सी, दिन और रात,
राधा नाम ही मेरा, अब तो है प्राण।हे लाडली, सुन लो, अब तो बुला लो,
इस रोती हुई बेटी को, गले से लगा लो।
नहीं चाहिए महल, नहीं चाहिए मान,
बस दे दो ब्रज-धूल, वही है सम्मान।जब तक साँस चले, नाम ना छूटेगा,
ब्रज से नाता कभी, ना टूटेगा।
दो पथिक फिर लौटेंगे, उसी ब्रज द्वार,
जहाँ हर कण बोले, राधे-राधे पुकार।राधा राधा राधा राधा – यही जप है हमारा
श्री राधे श्री राधे – यही धन है हमारा