दो पथिक, एक ब्रजधाम
बीमार तन था, मन था अधीर,
बुलावा आया बरसाने से,
कीर्ति मंदिर की छाँव में,
राधा ने फिर से थाम लिया।दाऊ जी के द्वार से चलकर,
गोकुल की गलियाँ देखीं,
रमण रेती में लोटे हम,
गोवर्धन की रज देखी।पच्चीस कोस की पहली फेरी,
पग-पग छाले, मन मतवाला,
एक कोस में हारे थे जो,
कृपा से पूरा धाम ही नापा।रात बारह बजे वृंदावन,
जग सोया, हम जाग रहे थे,
यमुना किनारे नाम का दीपक,
हम दो पथिक भाग रहे थे।निधिवन की नीरवता में,
लीला अब भी होती है,
बिहारी जी की प्रातः आरती,
आत्मा तक को धोती है।फिर पहुँचे टटिया स्थान में,
जहाँ कलियुग हारा है,
न बिजली है, न कोलाहल,
बस दीपों का उजियारा है।फोन बंद, मन चालू था,
अंधेरा था, आरती दिव्य थी,
एक दीया छोटे मंदिर में,
और शांति ही भव्य थी।और फिर वह बेलवन की रात,
सघन वन, सुनसान डगर,
दर्शन को आतुर नैना थे,
पर ठाकुर ने की नज़र।गाड़ी बिगड़ी, अँधेरा गहरा,
हृदय टूटा, पर आस न छूटी,
वृंदावन हर बार मिले ये,
जरूरी तो नहीं, यही तो सीख थी।दो पथिक हैं कौन भला?
मैं और मेरा मन कभी,
मैं और मेरे साथी कभी,
मैं और तुम, जो पढ़ रहे सभी।धाम तो एक ही है प्यारे,
मेरो वृंदावन, प्यारो वृंदावन,
जहाँ रज भी प्रसाद बन जाए,
ऐसो है ब्रजधाम, न्यारो वृंदावन।धन नहीं चाहिए, बल नहीं चाहिए,
चाहिए बस एक बुलावा,
जो एक बार राधे कह दे,
उसका हो ही जाता है ब्रज में ठिकाना।
राधे-राधे।