दो पथिक एक ब्रजधाम

दो पथिक चले हैं, एक डगर पर,

मंज़िल है ब्रज, प्रेम का नगर।

 

यमुना के घाट पर सुबह की किरण,

मंदिरों की घंटी में गूँजे भजन।

 

वृंदावन की गलियों में प्रेम बसा है,

हर गली में राधा-कृष्ण का वासा है।

 

निधिवन की छाँव में, शांति का एहसास,

पेड़ों की सरसराहट में, ब्रज का वास।

 

मथुरा की मिट्टी में, कान्हा का बचपन,

माखन की खुशबू में, प्रेम का बंधन।

 

रासलीला की रात में, प्रेम का नृत्य,

राधा-कृष्ण के प्रेम का, यही है सार।

 

दो पथिकों की यात्रा, प्रेम की कहानी,

ब्रज की मिट्टी ने, लिखी अपनी निशानी।

 

घाट पर दीप जलाए, मन में एक आस,

ब्रज में हर पल, प्रेम का वास।

 

बुज़ुर्ग का आशीर्वाद, यात्रा का सार,

ब्रज आने वाला, कभी नहीं जाता खाली यार।

 

दो पथिक चले हैं, एक डगर पर,

मंज़िल है ब्रज, प्रेम का नगर।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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Ankita Singh