प्रस्तावना

ये पुस्तक दो पथिकों की यात्रा का वर्णन है।    

 

पहली पथिक है – एक ऐसी लड़की जो अपने जीवन के शोर से थक कर पहली बार वृंदावन आती है। उसे लगता है कि वह अकेली आई है, पर यहाँ आकर उसे पता चलता है कि ब्रज में कोई अकेला नहीं आता, सबको राधा रानी बुलाती हैं।

दूसरा पथिक है – ब्रज में ही रहने वाला एक युवक, जिसका जीवन ही ब्रज है। जो बाहर से बहुत साधारण दिखता है, पर जिसके भीतर श्याम के प्रति अटूट प्रेम है।

                                पुस्तक के पहले भाग में आप देखेंगे कि कैसे ये दोनों पथिक टकराते हैं, कैसे उनके विचार अलग हैं, कैसे एक दुनिया को तर्क से देखती है और दूसरा सब कुछ प्रेम से देखता है।

दूसरे भाग में आप देखेंगे वृंदावन की गलियाँ, यमुना जी की आरती, बांकेबिहारी जी के दर्शन, बरसाने की होली और गोवर्धन की परिक्रमा और अंतिम भाग में आप समझेंगे इस पुस्तक के नाम का अर्थ -“एक ब्रजधाम”। कि मंज़िल अलग नहीं है। जब हृदय में राधा-कृष्ण का दिव्य प्रेम बस जाता है, तो हर राह अंत में एक ही धाम पर ले जाती है।

मैंने इस पुस्तक में कोई काल्पनिक प्रेम कहानी नहीं लिखी है। मैंने वही लिखा है जो मैंने ब्रज में देखा है -कि कैसे एक नास्तिक भी आस्तिक बन जाता है, कैसे एक भटका हुआ पथिक भी अपना घर पा लेता है।

यदि आप भी कभी जीवन में भटके हैं, तो ये पुस्तक आपके लिए ही है।

राधे-राधे।

अंकिता सिंह

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Ankita Singh